Saturday, 30 November 2013

                                      मर्यादा  तो सभी के लिए 

किसी भी सभ्य समाज की शर्त ही यही होती है कि सभी के लिए स्पेस हो , सभी के मान - मर्यादा  की भेदरहित सुरक्षा हो , इसीलिय संविधान को सबसे ऊपर माना गया।  दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक समाज व देश का गौरव  हमसे जुड़ा है जहां विधायिका , कार्यपालिका और नयायपालिका की अपनी अहम भूमिका है जिससे व्यस्था का नियमन और संचालन होता है । लेकिन जनतंत्र में चौथा स्तम्भ मीडिया भी अपनी खास अहमियत रखता है । इसका प्रमाण है कि 'न्यायकि सक्रियता'  के बाद एक जुमला 'मीडिया ट्रायल ' इसके भी हिस्से में आया। जाहिर है इस स्तम्भ से लोगो को काफी उम्मीद  बंधी  रहती है ।  जब इस  तरह  के विश्वास  को ठेस  पहुँचने  जैसी घटनाए  सामने  आती है । तो  जरूरी  हो जाता है कि एक बार फिर हम  अपने परिवेश  और मूल्यो पर  पुनर्विचार करे । साहित्य में जिस तरह अपने  समाज  और इतिहास का  अक्स प्रतिबिंबित  होता है  उसी  तरह मीडिया  भी  माधयम बनता है।  भले ही  इसे फौरी  साहित्य  कहें लेकिन  इसका प्रभाव व्यापक और दीर्घकालिक होता है । ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में  जब अमर्यादित आचरण के मामले  गूंजे तब थोड़े वक़्त के लिए जरूर  निराशा गहराती  है । तहलका  साप्ताहिक  पत्रिका  के संपादक तरुण  तेजपाल पर  उनकी सहकर्मी पत्रकार ने  गोवा  में आयोजित  थिंक  फेस्ट  कार्यक्रम कि कवरेज के बाद  अपने सात  यौन  उत्पीड़न  का आरोप  लगया  और पत्रिका  में प्रबंध संपादक  शोमा  चौधरी  को ईमेल  किया । बात बढ़ने  पर जब मामला  पब्लिक  डोमेन   में आ गया तब तेजपाल ने  माफी  मांगी  और खुद के लिए सजा  भी  तय  करते हुआ  शीर्ष  प्रबंधन  को बतया  कि ६  महीने  वह  प्रायश्चित  के रूप  में संपादक  पद से  विरत  रहेंगे । इस पर असंतोष जताते हुए पीड़िता ने अपने साथ न्याय किये जाने कि बात कही , तब इस पर जांच समिति बैठा दी गई। रिपोर्ट जब आयेगी तब कि बात । फ़िलहाल तो रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी है । हैरत  और अफ़सोस दोनों है । याद करें , तहलका डॉट कॉम ने एक वक़्त में एनडीए सरकार में घूसखोरी और घोटालो के मामलों का स्टिंग ऑपरेशन कर तहलका मचा दिया था । यही वजह रही कि बाद में जब इसने पत्रिका का  रूप  लिया तो  खुशवंत  सिंह  , उर्वशी  बुटालिया  और अरुंधती  राय जैसी  नामी  गिरामी  हस्तियां  इससे  जुडी ।  लगा कि मीडिया के क्षेत्र में  शुचिता  और  मर्यादा के साथ  ही  प्रगतिशील  विचारधारा  को प्रमुखता  मिलेगी । विशेष  रूप से इस  दौर  में जो जेंडर  इंसेंसिटिविटी बढ़ती  जा रही है और उससे  निपटने में  सक्ष्म  भूमिका  यह  पार्टीका निभाएगी । लेकिन जो पिछले  ७  ,८  नवंबर  को गोआ  में एक प्रबुद्ध  कार्यक्रम के बाद हुआ, सवाल पैदा करता है । लेकिन  इस सवाल कि भूमिका  यदि समझ ले तो  शायद  कोई झरोखा  समाधान  का भी दिखाई  देने लगे । दरअसल , जिस  कॉकटेल  और पेज ३ स्टाइल  में  हम अपनी  सभ्यता को अगेय ले जा  रहे है उसमे  कोई भी वोडका  अथवा  शैम्पियन  कि कोई एक घूट  " वल्गर " बना सकती है । सिर्फ तर्कों  का पहाड़  कड़ा करने से  अथवा  नैतिकता  के लम्बे  चौड़े  बहस  को आमंत्रित  करने  से  राह  नही निकलती । यह  तो 
वस्तुस्थिति  को समझने  और उसकी  सम्यकता  को प्रोत्साहित   करने से ही निकल सकती है । 

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