Tuesday, 10 December 2013

                            परिवर्तन का प्राइम टाइम!

एक वक्त के बाद बदलती सोच हुई चीजें नोटिस की जाती हैं जबकि बदलाव तो हर लम्हा हो रहा होता है। वर्तमान में देश के भीतर सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की बयार महसूस की जाने लगी है। लंबे वक्त से जेण्डर इश्यू जो संगोष्ठियों, किताबों, नरकों की विषय वस्तु बना हुआ था बीते कुछके वर्ष से सड़कों पर हाथ में लेकार्ड लिए उइ खड़ा हुआ जिसका असर देश की संसद ने भी महसूस किया अथवा कहें विवशता में महसूस करना पड़ा लेकिन अच्छी बात कि महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए एक सबल हथियार कानून के रुप में प्राप्त हुआ। 21वीं सदी के पूर्वाद्ध में वर्ष 2013 को महिला संबंधी कानून के लिए मील का पत्थर के रुप में याद किया जाएगा। सहअस्तित्व की लयता को बनाये रखने में निर्भया के बहाने देश भर में समवेत ढंग से चला आंदोलन इसलिए भी स्मृतियों का हिस्सा बना रहेगा और लोगों को प्रेरित भी करता रहेगा क्योंकि इससे पूर्व इस सवाल पर सदियों की गर्द पड़ी हुई थी।
पुरुष सत्तात्मक समाज ने परम्पराओं के नाम पर अपने हितपोषी क्षेपक जोड़ दिए थे और उसी का हवाला देते हुए जेण्डर इम्बैलेन्स बना हुआ था। लेकिन धीर-धीरे इसके विरोध में आवाजें भी मुखर होने लगी थीं। अब उसे चिन्ह्ति किया गया है बस। इसी तरह राजनीतिक क्षेत्र में 70 के दशक से अराजनीतिक लोगों की दखल बढ़ना शुरु हो गयी थी। ‘मनी-मसिल पॉवर’ जैसे जुमले अस्तित्व में आने लगे थे। नेता-नौकरशाह और माफिया गठजोड़ का असर समझ साफ नीति नियंताओं के फैसलों पर दिखने लगा था। पब्लिक डिस्कोर्स में यह बात मुखर थी जिसका गाहे-बगाहे असर भी दिखा। सजायाफ्ता नेताओं की सदस्यता इमेज रेस में ही सही, लेकिन संसदीय राजनीति को पवित्र बनाये रखने की दिशा में यह बहुत मददगार होने वाला है। इसे भी लंबे वक्त तक लोग नहीं भूल पाएंगे। यह सब विदा होते वर्ष के कछुके महीनों के भीतर ही मूर्तरुप ले पाया। इसी तरह शायद अब यह धारणा भी टूटने का वक्त करीब है कि जनता को नये चुनाव के समय आश्वासनों का फुहारा देने की जरुरत है। बाकी नेतागण अपनी मस्ती में डूबे रह सकते हैं। फिलहाल तो आम चुनाव से पहले सेमीफाइनल समझे जा रहे पांच विधानसभा के चुनाव नतीजे आने वाले है। प्री-पोस्ट सर्वे नतीजे जहां भाजपा को उत्साहित करने वाले हैं। वहीं कांग्रेस को चिंतित करने वाले। वास्तविक नतीजों से तस्वीर पूरी तरह से साफ हो जाएगी। लेकिन इतना तय है कि महंगाई और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस का जो अब तक रुख रहा है उससे जनाक्रोश बढ़ा है और पिछले दिनों वोटरों की भारी तादाद उमड़ने की एक वजह यह भी हो सकती है। इसमें दो राय नहीं। फिलहाल जो हालात हैं उसमें राजनीतिक बदलाव की मांग प्रखर एवं मुखर है। इसीलिए इसे बदलाव का प्राइम टाइम कहा जा सकता है। इस जरुरत को जनमानस ने कितनी गंभीरता से लिया है ,इसका पता तो नतीजे के बाद ही चलेगा। फ़िलहाल एक बेहतर परिदृश्य की उम्मीद की जानी चाहिए । 

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