सोच का बदलता दायरा
सहमतियों के दायरे टूट रहे हैं। प्राइवेट स्पेस का आग्रह बढ़ा है। परम्पराएं जिससे परवशता ध्वनित होती हो उसका निषेध भी शुरू हो गया है। यह हमारे समय की अपनी चुनौती है। देह विमर्श की परिधि में हैं। भारतीय परिवेश में हालांकि इसके आद्योपांत ज्ञाता रहे हैं ऋषि वात्सायन। उनकी महिमा प्रतिष्ठित है। इसलिए इस प्रश्न के नये कलेवर से विस्मित होने की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान में यह नये सवालों और उसकी चुनौतियों के साथ प्रस्तुत है। ग्रामीण संस्कृति में भी जहां अर्थोपार्जन में स्त्री-पुरूष की सहभागिता रही है, वहां सहमतियों-असहमतियों के स्वर फूटते रहे हैं। लेकिन उसे विस्तार कभी नहीं मिल पाया क्योंकि सामंती ताकतों का वर्चस्व रहा। किन्तु अब इस हाईटेकी दौर में बढ़ती पारदर्शिता के बीच निकटता बढ़ी है तो दृष्टिकोणों का टकराव भी बढ़ा है। मन तो सदियों पुराने नियमों में आबद्ध लेकिन देह की अभिव्यक्ति में निजता का सम्पुट गहरा हुआ है। इसलिए सहमतियां एक बार फिर नये संदर्भों के केन्द्र में हैं। इसकी अनदेखी से सामाजिक-राजनीतिक ही नहीं आर्थिक विषमताएं भी जन्म ले रही हैं। स्थिति ऐसी है कि पीछे नहीं लौटा जा सकता। और आगे बढ़ने पर आवेगों-संवेगों के नियमन की मांग बढ़ती है जिसका निर्वाह नहीं हो पा रहा है और हम सबके बीच एक विद्रूप पसर रहा है। यह स्थिति घर-बाहर या कहीं की भी हो सकती है। स्त्री पक्ष का यह प्रश्न आज तक अनुत्तरित है कि हिंसा-कुंठा के लिए वह ही निशाना क्यों? ऐसे रहे, वैसे रहे या फिर पर्दे में रहे जैसे जुमले उसी के हिस्से में क्यों? उसे एक व्यक्ति के तौर पर क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? एक लंबा विमर्श जो पश्चिम में औद्योगिक क्रातिं के बाद संस्थागत हुआ था, वह बीते दो दशक से हमारे भारतीय परिवेश में बड़ी तीव्रता से मुखर हुआ है। साहित्य में इसका असर परिलक्षित हुआ है। विज्ञापन जगत में नारी देह का बढ़ता वर्चस्व कहीं न कहीं आर्थिक सबलता का हेतु बना है। इसकी ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक टूथपेस्ट भी बिना किसी नारी छवि के नहीं आकृष्ट करता। अरबों-खरबों का विज्ञापन बाजार स्त्री देह पर निर्भर है। इसका यह अर्थ तो कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि स्त्री देह की अहमियत टूथपेस्ट की हो गयी है। वह बिकाऊ है। नहीं, नहीं और नहीं। वह उसका व्यावसायिक संसार है, जहां वह दैहिक सौष्ठव को अभिव्यक्ति देती है लेकिन इसके अलावा वह किसी की बेटी, मां और पत्नी भी हो सकती है या फिर कोई अन्तरंग मित्र। आर्थिक परिदृश्य में पेइंग गेस्ट या फिर ‘सेम रूम शेयरिंग’ चलन बढ़ा है जिसे ‘लिव इन’ के नाम से जाना जाता है। इस नये व्याकरण को लेकर कुछ विसंगतियां भी पैदा हो रही हैं जिस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपना अभिमत प्रकट करते हुए सरकार से समीचीन कानून बनाने को कहा है। वैसे भी समय की सुई को पीछे नहीं ले जा सकते। हां, इतना जरूर कर सकते हैं कि समय को समझते हुए उसका कितना सार्थक इस्तेमाल होे उस बारे में प्रयास हो। नये मूल्यों को गढ़े जाने का वक्त है। ठीक है मिट्टी वही है लेकिन जो आकार दिया जाना है वह तो नया ही होना चाहिए। ऐसे समय में हाल-फिलहाल की घटनाओं से चिंतित होने की बजाय उसे सही अर्थ देने में आगे बढ़ा जाना चाहिए। पारदर्शिता की बढ़ती मांग का स्वागत हर हाल में किया जाना चाहिए कुछ सवाल फौरी तौर पर अटपटे लग सकते हैं लेकिन उसे खारिज नहीं किया जा सकता।
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