Saturday, 14 December 2013

                                     ऊहापोह में कांग्रेस

अपने सवा सौ वर्ष के सफर में कांग्रेस के लिए यह समय राजनीतिक दृष्टि से काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है। परम्परागत विपक्ष भारतीय जनता पार्टी है। गठबंधन के साथी भी नयी परिस्थितियों में मोल-भाव करने के मूड में हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने इसका संकेत दे दिया है। सिविल सोसायटी के लोग भी अब सत्ता नियमन के नायक के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वहन करते दिखाई देते हैं। इसी सोशल फोर्स के उभार से राजनीति के क्षेत्र में जिस पारदर्शिता की मांग को संबल मिला है उसी का नतीजा है आम आदमी पार्टी यानि ‘आप’। इस नवोदित दल ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत का एहसास करा दिया है। भाजपा के इनकार के बाद संभव है दिल्ली में ‘आप’ की सरकार। राजस्थान और दिल्ली गंवा चुकी कांग्रेस प्रस्तावित आम चुनाव को लेकर इतनी चिंतित है कि प्रमुख विपक्षी दल के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के मुकाबले अपने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी को उतारने से हिचकिचा रही है। यही नहीं, कुछ ऐसे मामलों पर जहां गंभीर विमर्श के बाद ही कुछ कहा जाना चाहिए वहां भी उतावलेपन की आहट मिल रही है। समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के फैसले को पलटे जाने के बाद आनन-फानन में कांग्रेस की तरफ से जो प्रतिक्रिया आई है, वह हड़बड़ी और ऊहापोह दोनों को उजागर करती है। इसमें दो राय नहीं, इस तरह का यौनिक जीवन जीने वालों की एक तादाद है हमारे समाज में और यह भी सही है कि उन्हें समझा जाना चाहिए। इसके लिए जिस धारा 377 को हटाने की बात कही जा रही है उसके बारे में गंभीर चिंतन-मनन की जरूरत होती है। सिर्फ एक तबके को चुनावी मौसम में अपने से जोड़ने के वास्ते तपाक से यह कह देना कि समलैंगिकता से संबंधित अध्यादेश भी लाया जा सकता है। कई सवाल खड़े करता है। कांग्रेस की सुप्रीमो सोनिया गांधी और राहुल गांधी ताजा फैसले के विरोध में यदि इसलिए हैं कि इस मुद्दे पर मोदी खामोश क्यों हैं? तो मंशा साफ हो जाती है। यूपीए सत्ता में है। इस बारे में भी कानून बनाकर समलैंगिकों के जीवन को सहज किया जा सकता है। यह काम अदालत क्यों करें? अदालत की जिम्मेदारी तो जो संविधान में है, उसकी व्याख्या करना होता है। सामाजिक बदलावों को आकार देने की जिम्मेदारी तो जनप्रतिनिधियों की पंचायत में निहित है। लेकिन कांग्रेस सिर्फ मोदी को घेरने के लिए कोई भी फौरी स्टैण्ड ले सकती है। शायद अब भी यह पार्टी नहीं समझना चाहती कि उसे लेकर जनता के बीच जबर्दस्त आक्रोश है। महंगाई और भ्रष्टाचार के चलते देश का विकास उस लिहाज से नहीं हो पा रहा, जिसकी अपेक्षा की जाती है। बेरोजगारों की फौज बढ़ रही है। सरकारी खजाना ‘पापुलिस्ट प्रोग्राम’ को मूर्तरूप देने के लिए लुटाया जा रहा है। मनरेगा के बाद फूड सिक्योरिटी, यह अब सिर्फ चुनावी चोंचले हैं। आधारभूत विकास हो, इस बारे में सोचे जाने की आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब पार्टियां अपनी सियासत चमकाने से परहेज करें। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इसीलिए बीते 65 वर्षों में कुछ लोग भले ही उन्नत और समृद्ध हुए हों, लेकिन आम आदमी की हालत में कोई गुणात्मक सुधार नहीं हुआ है। गरीबों की तादाद बढ़ी है। जीना मुहाल हो गया है। ऐसे में, सभी दलों के लिए यह ऐतिहासिक काल है, देश की अवाम के बारे में सोचें। खुद का चिन्तन बहुत हो चुका। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दिल्ली जैसी चुनौतियां शेष राज्यों में भी पैदा होंगी।

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