Friday, 27 December 2013
Saturday, 14 December 2013
ऊहापोह में कांग्रेस
अपने सवा सौ वर्ष के सफर में कांग्रेस के लिए यह समय राजनीतिक दृष्टि से काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है। परम्परागत विपक्ष भारतीय जनता पार्टी है। गठबंधन के साथी भी नयी परिस्थितियों में मोल-भाव करने के मूड में हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने इसका संकेत दे दिया है। सिविल सोसायटी के लोग भी अब सत्ता नियमन के नायक के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वहन करते दिखाई देते हैं। इसी सोशल फोर्स के उभार से राजनीति के क्षेत्र में जिस पारदर्शिता की मांग को संबल मिला है उसी का नतीजा है आम आदमी पार्टी यानि ‘आप’। इस नवोदित दल ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत का एहसास करा दिया है। भाजपा के इनकार के बाद संभव है दिल्ली में ‘आप’ की सरकार। राजस्थान और दिल्ली गंवा चुकी कांग्रेस प्रस्तावित आम चुनाव को लेकर इतनी चिंतित है कि प्रमुख विपक्षी दल के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के मुकाबले अपने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी को उतारने से हिचकिचा रही है। यही नहीं, कुछ ऐसे मामलों पर जहां गंभीर विमर्श के बाद ही कुछ कहा जाना चाहिए वहां भी उतावलेपन की आहट मिल रही है। समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के फैसले को पलटे जाने के बाद आनन-फानन में कांग्रेस की तरफ से जो प्रतिक्रिया आई है, वह हड़बड़ी और ऊहापोह दोनों को उजागर करती है। इसमें दो राय नहीं, इस तरह का यौनिक जीवन जीने वालों की एक तादाद है हमारे समाज में और यह भी सही है कि उन्हें समझा जाना चाहिए। इसके लिए जिस धारा 377 को हटाने की बात कही जा रही है उसके बारे में गंभीर चिंतन-मनन की जरूरत होती है। सिर्फ एक तबके को चुनावी मौसम में अपने से जोड़ने के वास्ते तपाक से यह कह देना कि समलैंगिकता से संबंधित अध्यादेश भी लाया जा सकता है। कई सवाल खड़े करता है। कांग्रेस की सुप्रीमो सोनिया गांधी और राहुल गांधी ताजा फैसले के विरोध में यदि इसलिए हैं कि इस मुद्दे पर मोदी खामोश क्यों हैं? तो मंशा साफ हो जाती है। यूपीए सत्ता में है। इस बारे में भी कानून बनाकर समलैंगिकों के जीवन को सहज किया जा सकता है। यह काम अदालत क्यों करें? अदालत की जिम्मेदारी तो जो संविधान में है, उसकी व्याख्या करना होता है। सामाजिक बदलावों को आकार देने की जिम्मेदारी तो जनप्रतिनिधियों की पंचायत में निहित है। लेकिन कांग्रेस सिर्फ मोदी को घेरने के लिए कोई भी फौरी स्टैण्ड ले सकती है। शायद अब भी यह पार्टी नहीं समझना चाहती कि उसे लेकर जनता के बीच जबर्दस्त आक्रोश है। महंगाई और भ्रष्टाचार के चलते देश का विकास उस लिहाज से नहीं हो पा रहा, जिसकी अपेक्षा की जाती है। बेरोजगारों की फौज बढ़ रही है। सरकारी खजाना ‘पापुलिस्ट प्रोग्राम’ को मूर्तरूप देने के लिए लुटाया जा रहा है। मनरेगा के बाद फूड सिक्योरिटी, यह अब सिर्फ चुनावी चोंचले हैं। आधारभूत विकास हो, इस बारे में सोचे जाने की आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब पार्टियां अपनी सियासत चमकाने से परहेज करें। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इसीलिए बीते 65 वर्षों में कुछ लोग भले ही उन्नत और समृद्ध हुए हों, लेकिन आम आदमी की हालत में कोई गुणात्मक सुधार नहीं हुआ है। गरीबों की तादाद बढ़ी है। जीना मुहाल हो गया है। ऐसे में, सभी दलों के लिए यह ऐतिहासिक काल है, देश की अवाम के बारे में सोचें। खुद का चिन्तन बहुत हो चुका। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दिल्ली जैसी चुनौतियां शेष राज्यों में भी पैदा होंगी।Tuesday, 10 December 2013
सोच का बदलता दायरा
सहमतियों के दायरे टूट रहे हैं। प्राइवेट स्पेस का आग्रह बढ़ा है। परम्पराएं जिससे परवशता ध्वनित होती हो उसका निषेध भी शुरू हो गया है। यह हमारे समय की अपनी चुनौती है। देह विमर्श की परिधि में हैं। भारतीय परिवेश में हालांकि इसके आद्योपांत ज्ञाता रहे हैं ऋषि वात्सायन। उनकी महिमा प्रतिष्ठित है। इसलिए इस प्रश्न के नये कलेवर से विस्मित होने की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान में यह नये सवालों और उसकी चुनौतियों के साथ प्रस्तुत है। ग्रामीण संस्कृति में भी जहां अर्थोपार्जन में स्त्री-पुरूष की सहभागिता रही है, वहां सहमतियों-असहमतियों के स्वर फूटते रहे हैं। लेकिन उसे विस्तार कभी नहीं मिल पाया क्योंकि सामंती ताकतों का वर्चस्व रहा। किन्तु अब इस हाईटेकी दौर में बढ़ती पारदर्शिता के बीच निकटता बढ़ी है तो दृष्टिकोणों का टकराव भी बढ़ा है। मन तो सदियों पुराने नियमों में आबद्ध लेकिन देह की अभिव्यक्ति में निजता का सम्पुट गहरा हुआ है। इसलिए सहमतियां एक बार फिर नये संदर्भों के केन्द्र में हैं। इसकी अनदेखी से सामाजिक-राजनीतिक ही नहीं आर्थिक विषमताएं भी जन्म ले रही हैं। स्थिति ऐसी है कि पीछे नहीं लौटा जा सकता। और आगे बढ़ने पर आवेगों-संवेगों के नियमन की मांग बढ़ती है जिसका निर्वाह नहीं हो पा रहा है और हम सबके बीच एक विद्रूप पसर रहा है। यह स्थिति घर-बाहर या कहीं की भी हो सकती है। स्त्री पक्ष का यह प्रश्न आज तक अनुत्तरित है कि हिंसा-कुंठा के लिए वह ही निशाना क्यों? ऐसे रहे, वैसे रहे या फिर पर्दे में रहे जैसे जुमले उसी के हिस्से में क्यों? उसे एक व्यक्ति के तौर पर क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? एक लंबा विमर्श जो पश्चिम में औद्योगिक क्रातिं के बाद संस्थागत हुआ था, वह बीते दो दशक से हमारे भारतीय परिवेश में बड़ी तीव्रता से मुखर हुआ है। साहित्य में इसका असर परिलक्षित हुआ है। विज्ञापन जगत में नारी देह का बढ़ता वर्चस्व कहीं न कहीं आर्थिक सबलता का हेतु बना है। इसकी ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक टूथपेस्ट भी बिना किसी नारी छवि के नहीं आकृष्ट करता। अरबों-खरबों का विज्ञापन बाजार स्त्री देह पर निर्भर है। इसका यह अर्थ तो कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि स्त्री देह की अहमियत टूथपेस्ट की हो गयी है। वह बिकाऊ है। नहीं, नहीं और नहीं। वह उसका व्यावसायिक संसार है, जहां वह दैहिक सौष्ठव को अभिव्यक्ति देती है लेकिन इसके अलावा वह किसी की बेटी, मां और पत्नी भी हो सकती है या फिर कोई अन्तरंग मित्र। आर्थिक परिदृश्य में पेइंग गेस्ट या फिर ‘सेम रूम शेयरिंग’ चलन बढ़ा है जिसे ‘लिव इन’ के नाम से जाना जाता है। इस नये व्याकरण को लेकर कुछ विसंगतियां भी पैदा हो रही हैं जिस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपना अभिमत प्रकट करते हुए सरकार से समीचीन कानून बनाने को कहा है। वैसे भी समय की सुई को पीछे नहीं ले जा सकते। हां, इतना जरूर कर सकते हैं कि समय को समझते हुए उसका कितना सार्थक इस्तेमाल होे उस बारे में प्रयास हो। नये मूल्यों को गढ़े जाने का वक्त है। ठीक है मिट्टी वही है लेकिन जो आकार दिया जाना है वह तो नया ही होना चाहिए। ऐसे समय में हाल-फिलहाल की घटनाओं से चिंतित होने की बजाय उसे सही अर्थ देने में आगे बढ़ा जाना चाहिए। पारदर्शिता की बढ़ती मांग का स्वागत हर हाल में किया जाना चाहिए कुछ सवाल फौरी तौर पर अटपटे लग सकते हैं लेकिन उसे खारिज नहीं किया जा सकता।परिवर्तन का प्राइम टाइम!
एक वक्त के बाद बदलती सोच हुई चीजें नोटिस की जाती हैं जबकि बदलाव तो हर लम्हा हो रहा होता है। वर्तमान में देश के भीतर सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की बयार महसूस की जाने लगी है। लंबे वक्त से जेण्डर इश्यू जो संगोष्ठियों, किताबों, नरकों की विषय वस्तु बना हुआ था बीते कुछके वर्ष से सड़कों पर हाथ में लेकार्ड लिए उइ खड़ा हुआ जिसका असर देश की संसद ने भी महसूस किया अथवा कहें विवशता में महसूस करना पड़ा लेकिन अच्छी बात कि महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए एक सबल हथियार कानून के रुप में प्राप्त हुआ। 21वीं सदी के पूर्वाद्ध में वर्ष 2013 को महिला संबंधी कानून के लिए मील का पत्थर के रुप में याद किया जाएगा। सहअस्तित्व की लयता को बनाये रखने में निर्भया के बहाने देश भर में समवेत ढंग से चला आंदोलन इसलिए भी स्मृतियों का हिस्सा बना रहेगा और लोगों को प्रेरित भी करता रहेगा क्योंकि इससे पूर्व इस सवाल पर सदियों की गर्द पड़ी हुई थी।
पुरुष सत्तात्मक समाज ने परम्पराओं के नाम पर अपने हितपोषी क्षेपक जोड़ दिए थे और उसी का हवाला देते हुए जेण्डर इम्बैलेन्स बना हुआ था। लेकिन धीर-धीरे इसके विरोध में आवाजें भी मुखर होने लगी थीं। अब उसे चिन्ह्ति किया गया है बस। इसी तरह राजनीतिक क्षेत्र में 70 के दशक से अराजनीतिक लोगों की दखल बढ़ना शुरु हो गयी थी। ‘मनी-मसिल पॉवर’ जैसे जुमले अस्तित्व में आने लगे थे। नेता-नौकरशाह और माफिया गठजोड़ का असर समझ साफ नीति नियंताओं के फैसलों पर दिखने लगा था। पब्लिक डिस्कोर्स में यह बात मुखर थी जिसका गाहे-बगाहे असर भी दिखा। सजायाफ्ता नेताओं की सदस्यता इमेज रेस में ही सही, लेकिन संसदीय राजनीति को पवित्र बनाये रखने की दिशा में यह बहुत मददगार होने वाला है। इसे भी लंबे वक्त तक लोग नहीं भूल पाएंगे। यह सब विदा होते वर्ष के कछुके महीनों के भीतर ही मूर्तरुप ले पाया। इसी तरह शायद अब यह धारणा भी टूटने का वक्त करीब है कि जनता को नये चुनाव के समय आश्वासनों का फुहारा देने की जरुरत है। बाकी नेतागण अपनी मस्ती में डूबे रह सकते हैं। फिलहाल तो आम चुनाव से पहले सेमीफाइनल समझे जा रहे पांच विधानसभा के चुनाव नतीजे आने वाले है। प्री-पोस्ट सर्वे नतीजे जहां भाजपा को उत्साहित करने वाले हैं। वहीं कांग्रेस को चिंतित करने वाले। वास्तविक नतीजों से तस्वीर पूरी तरह से साफ हो जाएगी। लेकिन इतना तय है कि महंगाई और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस का जो अब तक रुख रहा है उससे जनाक्रोश बढ़ा है और पिछले दिनों वोटरों की भारी तादाद उमड़ने की एक वजह यह भी हो सकती है। इसमें दो राय नहीं। फिलहाल जो हालात हैं उसमें राजनीतिक बदलाव की मांग प्रखर एवं मुखर है। इसीलिए इसे बदलाव का प्राइम टाइम कहा जा सकता है। इस जरुरत को जनमानस ने कितनी गंभीरता से लिया है ,इसका पता तो नतीजे के बाद ही चलेगा। फ़िलहाल एक बेहतर परिदृश्य की उम्मीद की जानी चाहिए ।
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