Monday, 20 January 2014

                                         सुनंदा का जाना...

मनमोहन सरकार के मानव संसाधन मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की एक होटल में हुई मौत ने कई सवाल खड़े किये हैं। हालांकि थरूर और सुनंदा की यह तीसरी शादी थी। यह भी कि पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के शशि थरूर से कथित रिश्ते को सुनंदा काफी परेशान चल रहीं थीं। उन्होंने सोशल मीडिया में ट्वीट कर बताया था कि वह अपने और थरूर के बीच किसी तीसरे को नहीं आने देंगी। यह भी कि इसके बाद सोशल मीडिया में यह खबर आग की तरह फैल गई थी। आखिरकार शशि थरूर से अपने वैवाहिक रिश्तों को लेकर सुनंदा ने फिर ट्वीट करके बताया कि ‘आल इज वेल’। उनकी शादी ठीक-ठाक चल रही है और वे दोनों ठीक हैं। लेकिन इसी शुक्रवार को जब तालकटोरा स्टेडियम में आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी की कान्फ्रेंस चल रही थी तब दिल्ली के ही होटल में सुनंदा मरी पाई गयीं। इससे पिछले दिनों की ट्वीट और उससे जुड़ी बातें एक बार फिर ताजा हो गयीं। हालांकि तरार ने ट्वीट किया ‘ओह माई गॉड, व्हाट दि हेल!’ फिर भी यह सवाल तो है कि जब सब कुछ ठीक चल रहा था तो वह होटल में क्यों रूक रही थीं? और फिर ऐसा क्या हो गया कि उनकी मौत हो गयी। जवाब तो देश को चाहिए ही। मामला शशि थरूर से जुड़ा है, इसलिए भी। वास्तविकता तो देर-सवेर सामने आ ही जाएगी। फिर भी ऐसी घटनाएं चिंतित और दुखी दोनों करती हैं। चिंतित इसलिए कि हाईप्रोफाइल सोसाइटी में जहां महिलाएं प्राय: पराश्रित नहीं होती, वहां ऐसी संदिग्ध मौतें बेशक सवाल के रूप में सामने आती हैं। क्यों समर्थ महिलायें ‘वो’ फैक्टर के आगे निरूपाय और नि:सहाय हो जाती हैं, उन्हें तो डटकर आसन्न चुनौतियों का सामना करना चाहिए। समर्थ महिलायें तो बाकी महिलाओं के लिए प्रेरणास्पद होती हैं। नारी सशक्तिकरण के इस दौर में जहां स्त्रियोचित संवेदना को मुखर-प्रखर बनाने की दिशा में संवैधानिक स्तर पर भी प्रयास चल रहे हैं, वहां कोई भी महिला उपेक्षात्मक एकान्त का दंश क्यों झेले? ऐसे में पावरफुल महिला की ‘पीड़ित छवि’ हमारे प्रयासों की वास्तविकता को सामने ला देती है। सुनंदा का शनिवार की शाम बेशक अंतिम संस्कार हो गया लेकिन इस तरह से जाने को लेकर सवाल तो उठते रहेंगे ही।
भले ही उन सवालों के आईने में बाद में कोई संवैधानिक पहल न हो लेकिन सोचने के लिए ऐसी घटना विषय-वस्तु के रूप में स्मृतियों में बनी रहेगी। इसलिए भी कि अधकचरे मूल्यों के साथ जीने के चलते हम वास्तविकता का सामना करने से घबरा जाते हैं। और यही अवसाद के रूप में हमारी जिंदगी की लौ बुझा देता है। इसीलिए इस तथ्य को नहीं भूला जाना चाहिए कि पूर्वी संस्कृति में रिश्तों को वार्डरोब की शोभा बनाकर नहीं रहने दिया जाता बल्कि पूरे तन-मन से जीया जाता है। यही विशिष्टता हमें एकनिष्ठ बनाती और जीवन को कलात्मक ढंग से जीना सिखाती है। उम्मीद की जानी चाहिए ऐसी घटनाएं न के बराबर हों तो रिश्तों में विश्वास की महक बनी रहेगी।

                           यूपी में चढ़ता सियासी पारा!

संसदीय अंकगणित के लिहाज से भी उत्तर प्रदेश की अपनी बड़ी अहमियत है। 80 सीटें मायने रखती हैं, तब यह महत्व और बढ़ जाता है जब संभावित परिदृश्य में गठबंधन से जुड़े सवाल मुखर हों। कांग्रेस की घटती साख ने यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस की सत्ता में तीसरी पारी पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। इस बीच दूसरा गठबंधन नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस का फिलहाल जो स्वरूप है, उससे सत्ता की दावेदारी नहीं की जा सकती। यही वजह है कि इस गठबंधन के शीर्ष दल भारतीय जनता पार्टी का इरादा सत्ता के लिए जादुई आंकड़े 272 को छूना है। इस गठबंधन के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी अपनी जनसभाओं के माध्यम से हिंदी पट्टी में विशेष जोर लगा रहे हैं। दक्षिण और पूर्वोत्तर में पार्टी की प्रजेंस नगण्य है। जबकि इसकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी कांग्रेस बेहतर स्थिति में है। अब पेंच यह है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित 28 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस के समर्थन से सतारूढ़ आम आदमी पार्टी भी लोकसभा चुनाव के लिए ताल ठोक रही है। उसका भी इरादा हिंदी पट्टी पर अपनी पूरी ताकत झोंकने का है। यही वजह है हरियाणा में योगेन्द्र यादव की सक्रियता के बाद उत्तर प्रदेश में कुमार विश्वास और संजय सिंह की सक्रियता बढ़ गयी है। इसी 12 जनवरी को ‘आप’ की अमेठी में रैली है। मध्यम वर्ग में भ्रष्टाचार और महंगाई को लेकर काफी आक्रोश है, जिसे ‘आप’ यहां भुनाना चाह रही है। जबकि इसके उदय से पहले भाजपा स्वाभाविक दावेदार थी। यही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख ने भी इसीलिए ‘आप’ को हल्के में न लेने की बात कही है। भाजपा को यूपी से बड़ी उम्मीद है लेकिन बीच में ‘आप’ है जिसका प्रभाव अप्रत्याशित ढंग से शहरों-जिलों व कस्बों तक पहुंचता जा रहा है। हालांकि यूपी की राजनीति में जातिवादी समीकरण को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसी भरोसे सपा और बसपा आप को कमतर आंक रहे हैं लेकिन भीतर से घबराये हुए जरूर हैं। यही वजह है कि सपा नेतृत्व अपनी छवि को लेकर सतर्क और सजग हो गया है। सैफई महोत्सव में बॉलीवुड तड़के को लेकर उठे सियासी तूफान पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिस आक्रामक ढंग से सफाई पेश की और मीडिया के एक वर्ग पर निशाना साधा है, उससे अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति का पता चलता है। मुजफ्फरनगर हिंसा पीड़ितों के प्रति संवेदनहीनता को लेकर विपक्ष जिस तरह अखिलेश सरकार को घेर रहा है, चुनाव होने हैं तब ऐसे आरोप, छवि और माहौल दोनों खराब करते हैं। इस बीच बसपा भी मायावती के जन्मदिन के बहाने 15 जनवरी को लखनऊ में ‘रैला’ करके ताकत दिखाने की तैयारी में जुटी हुई है। यूपी में बढ़ती सियासी गतिविधियों से पारा बढ़ना स्वाभाविक है। आम तौर पर समझा जाता है कि जो यूपी में सबसे ज्यादा सीटें पाएगा उसकी उतनी ही दिल्ली में धमक बढ़ेगी। क्षेत्रीय दलों को लगता है कि दो बड़े गठबंधनों के कमजोर पड़ने से तीसरे मोर्चे जैसी कोई स्थिति बन सकती है। यदि ऐसी स्थिति बनती है तो सपा, बसपा के नेताओं को दिल्ली में शीर्ष पद के लिए अपनी संभावना भी दिखाई देती है। इसी संभावना ने सियासत गरमा दी है।

                             बतौर पीएम उपलब्धियां भी हैं

प्रधानमंत्री के रूप में शायद डॉ. मनमोहन सिंह की यह आखिरी प्रेस कान्फ्रेंस हो और ऐसा नहीं भी हो सकता। भविष्य को भला किसने ठीक ढंग से बांचा है, सभी अनुमान के इर्द-गिर्द परिक्रमा लगाते रहते हैं। जहां तक बतौर प्रधानमंत्री सिंह के इस दूसरे कार्यकाल की बात है तो यह कहना आसान है कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में बड़े-बड़े घोटाले हुए और उसमें प्रथम दृष्ट्या आरोपी मंत्रियों पर सम्यक कार्रवाई करने के बजाय, पक्ष में तब तक खड़े दिखाई दिये, जब तक सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा संदेश नहीं दिया। डॉ. सिंह की भूमिका के उस उलझन को भी समझा जा सकता है, जिसमें खुद वह ईमानदार हैं लेकिन उनके पीएमओ पर भ्रष्टाचार के छींटे पड़े। टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन और कोल ब्लाक को लेकर सीधे तौर पर घिरे सिंह साहब की त्रासदी यह है कि उनकी सादगी और ईमानदारी पर विपक्ष को भी कोई शक नहीं। लेकिन पीएम के तौर पर उन्हें इस तरह के सारे आरोपों से दो-चार होने की क्या मजबूरी रही होगी, इसे चुटकियों में नहीं समझा जा सकता। कई बार उनके पद की गरिमा से जाने-अनजाने खिलवाड़ भी हुआ लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिवाद नहीं हुआ। सजायाफ्ता माननीयों की सदस्यता रद्द करने के मामले मे कैबिनेट के रुख के विपरीत राहुल गांधी की सार्वजनिक हुंकार को भले ही पीएम के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण समझा गया हो अथवा किसी सीमा तक असम्मान माना गया हो लेकिन पीएम की खामोशी के गर्द में अप्रत्याशित घटना ज्यादा विस्तार नहीं पा सकी। इसे विरोधी पीएम की ‘मजबूरी’ कहते हैं तो कुछ इसे 10 जनपथ के प्रति वफादारी बताते हैं। लेकिन जो भी हो एक प्रधानमंत्री के रूप में नाकाम साबित हुए डॉ. सिंह को उनकी व्यक्तिगत छवि के लिए नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यह उनकी खासियत है और अवधारणा कुछ वर्षों में नहीं बनी है। डॉ. सिंह प्राध्यापक, रिजर्व बैंक के गर्वनर और देश के वित्त मंत्री की भूमिका से लेकर प्रधानमंत्री के रूप में कभी निजी तौर पर विवादित नहीं रहे। भरोसे के आदमी रहे, इसीलिए पीएम का दूसरा कार्यकाल भी कुछ महीनों में पूरा करने जा रहे हैं। डॉ. सिंह के कार्यकाल में जहां तक स्त्री सुरक्षा, जमीन और भ्रष्टाचार से लेकर लोकपाल बिल तक की मंजूरी के सवाल हंै तो इसका दूरगामी असर पड़ेगा। यौन हिंसा पर नये कानून को लेकर एक ऐसा माहौल जरूर बनेगा, जिसमें स्त्रियां अपनी निजता के साथ आने वाले वर्षों में खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करेंगी। जमीन अधिग्रहण कानून के बाद किसानों को अब मुआवजे को लेकर अफसोस नहीं जताना पड़ेगा और लोकपाल भी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में काफी हद तक कामयाब होता दिखेगा। अब अपराध से जुड़ने अथवा उसे बढ़ावा देने में ‘माननीय’ भी डरेंगे। जनसूचना के अधिकार ने पूरा परिदृश्य बदल कर रख दिया है। यह सब कुछ पीएम होने के नाते डॉ. सिंह के खाते में ही जाएगा। तो जहां सिर्फ भ्रष्टाचार की चर्चा होगी वहां उसमें संलिप्त लोगों पर कोर्ट के निर्देश पर ही सही, कार्रवाई की भी चर्चा होगी। एक बात और, पीएम ने अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में लोकसभा चुनाव का एजेण्डा भी साफ कर दिया, कहा कि नरेन्द्र मोदी यदि पीएम बने तो देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। हालांकि अगले गठबंधन की सरकार उन्होंने यूपीए की अगुवाई में बनने की संभावना जताई है। फिलहाल, जिस तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पीछे कांग्रेस खड़ी दिखाई देती है, उससे साफ है कि 128 वर्ष पुरानी यह पार्टी केन्द्र में भाजपा की ताजपोशी रोकना चाहती है, इससे पहले दिल्ली विधानसभा में यह ‘करिश्मा’ हो चुका है। वाकई कांग्रेस अपने खिलाफ उठे गुबार को भी बांटना जानती है। 

                                  ‘आप’ की चुनौतियां


आम आदमी पार्टी ‘आप’ का सत्ताधारी दल के रुप में उदय निश्चित तौर पर इस बात में भरोसा बढ़ाता है कि कुछ भी हो लेकिन असली जनार्दन तो जनता ही होती है। वास्तव में यही हमारे लोकतंत्र की ताकत है। तभी तो स्थापित दलों को चुनावी मैदान में धूल चाटनी पड़ी। लेकिन अब जब ‘अल्पमत की सरकार’ के रुप में अरविंद केजरीवाल से दिल्ली की जनता ने ढेर सारी उम्मीदें लगा रखी हैं तो साथ ही यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि दिल्ली पर पूरे देश की नजर है।
दिल्ली में जनान्दोलनों को शेष देश से बराबर की ताकत मिली थी। वजह यह प्रयोग सफल हुआ तो शेष देश में उस मॉडल को अपनाने की स्थिति बन सकेगी। इस उम्मीद को भी इस नयी ‘आप’ सरकार ने पूरा करना है। यह वाकई बड़ी चुनौती है। क्योंकि स्थापित दलों से निराश जनता की बढ़ी उम्मीदें उस नवोदित पार्टी से है, जिसको शासन, व्यवस्था का अनुभव नहीं है। फिर भी, पहली बार तो किसी के लिए भी जिम्मेदारी नयी ही होती है। बहरहाल, फौरी तौर पर दिल्ली में सबसे बड़ी चुनौती पानी-बिजली को लेकर है। कैसे केजरीवाल मुफ्त पानी दिलाएंगे और बिजली के दाम आधा कर पाएंगे। किन्तु जो सबसे बड़ा सवाल है। वह यह कि अब ‘आप’ को सत्ताधारी दल के चलते सभी का सहयोग प्राप्त करना होगा। जिस आम आदमी को उनकी नीतियों और संकल्पों से लाभ मिल सकता है, उसमें सभी शामिल हैं। भले ही वे कांग्रेस व भाजपा समर्थक हों या फिर किसी और दल से जुड़े हों। तो इसके लिए अपने रवैये में भी बदलाव लाने की जरूरत होगी। ऐसा इसलिए रेखांकित करना पड़ रहा है। क्योंकि जबसे ‘आप’ का उदय हुआ है, इसने अन्य दलों को अछूत मानकर उससे व्यवहार किया है। कई बार तो असंयमित भाषा सुनने को मिली है। प्रतिपक्ष के रूप में कड़क तेवर सुहाता है लेकिन सत्ताधारी दल होने के बाद उसमें गंभीरता, सहनशीलता और सौम्यता आनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो कई तरह की गैरजरूरी विसंगतियां पैदा होने लगती हैं। तो, असली चुनौती सभी को साथ लेकर चलने की होगी। दिल्ली देश की राजधानी है। यह आशानुरुप संभल गयी तो बाकी हिस्सों  में भी ‘आप’ का आधार बनेगा, मांग बढ़ेगी। लिहाजा यह एक अवसर भी है। इसे सिर्फ तीखी आलोचना करने में न खोयें। प्रतिपक्ष की बातों पर प्रतिक्रियावादी होने के बजाय उस पर सकारात्मक पहल करें। क्योंकि जो जवाब देने की स्थिति में पहुंचता है, उससे ज्यादा संयम की अपेक्षा होती है। कांग्रेस से तो यही गलती हुई, जिसकी सजा दिल्लीवासियों ने उसे दी। वरना, यह भी एक सच है कि तमाम घोटालों के बावजूद दिल्ली अन्तर्राष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरने लायक तत्कालीन शीला सरकार में ही हुई।