Monday, 20 January 2014

                           यूपी में चढ़ता सियासी पारा!

संसदीय अंकगणित के लिहाज से भी उत्तर प्रदेश की अपनी बड़ी अहमियत है। 80 सीटें मायने रखती हैं, तब यह महत्व और बढ़ जाता है जब संभावित परिदृश्य में गठबंधन से जुड़े सवाल मुखर हों। कांग्रेस की घटती साख ने यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस की सत्ता में तीसरी पारी पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। इस बीच दूसरा गठबंधन नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस का फिलहाल जो स्वरूप है, उससे सत्ता की दावेदारी नहीं की जा सकती। यही वजह है कि इस गठबंधन के शीर्ष दल भारतीय जनता पार्टी का इरादा सत्ता के लिए जादुई आंकड़े 272 को छूना है। इस गठबंधन के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी अपनी जनसभाओं के माध्यम से हिंदी पट्टी में विशेष जोर लगा रहे हैं। दक्षिण और पूर्वोत्तर में पार्टी की प्रजेंस नगण्य है। जबकि इसकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी कांग्रेस बेहतर स्थिति में है। अब पेंच यह है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित 28 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस के समर्थन से सतारूढ़ आम आदमी पार्टी भी लोकसभा चुनाव के लिए ताल ठोक रही है। उसका भी इरादा हिंदी पट्टी पर अपनी पूरी ताकत झोंकने का है। यही वजह है हरियाणा में योगेन्द्र यादव की सक्रियता के बाद उत्तर प्रदेश में कुमार विश्वास और संजय सिंह की सक्रियता बढ़ गयी है। इसी 12 जनवरी को ‘आप’ की अमेठी में रैली है। मध्यम वर्ग में भ्रष्टाचार और महंगाई को लेकर काफी आक्रोश है, जिसे ‘आप’ यहां भुनाना चाह रही है। जबकि इसके उदय से पहले भाजपा स्वाभाविक दावेदार थी। यही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख ने भी इसीलिए ‘आप’ को हल्के में न लेने की बात कही है। भाजपा को यूपी से बड़ी उम्मीद है लेकिन बीच में ‘आप’ है जिसका प्रभाव अप्रत्याशित ढंग से शहरों-जिलों व कस्बों तक पहुंचता जा रहा है। हालांकि यूपी की राजनीति में जातिवादी समीकरण को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसी भरोसे सपा और बसपा आप को कमतर आंक रहे हैं लेकिन भीतर से घबराये हुए जरूर हैं। यही वजह है कि सपा नेतृत्व अपनी छवि को लेकर सतर्क और सजग हो गया है। सैफई महोत्सव में बॉलीवुड तड़के को लेकर उठे सियासी तूफान पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिस आक्रामक ढंग से सफाई पेश की और मीडिया के एक वर्ग पर निशाना साधा है, उससे अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति का पता चलता है। मुजफ्फरनगर हिंसा पीड़ितों के प्रति संवेदनहीनता को लेकर विपक्ष जिस तरह अखिलेश सरकार को घेर रहा है, चुनाव होने हैं तब ऐसे आरोप, छवि और माहौल दोनों खराब करते हैं। इस बीच बसपा भी मायावती के जन्मदिन के बहाने 15 जनवरी को लखनऊ में ‘रैला’ करके ताकत दिखाने की तैयारी में जुटी हुई है। यूपी में बढ़ती सियासी गतिविधियों से पारा बढ़ना स्वाभाविक है। आम तौर पर समझा जाता है कि जो यूपी में सबसे ज्यादा सीटें पाएगा उसकी उतनी ही दिल्ली में धमक बढ़ेगी। क्षेत्रीय दलों को लगता है कि दो बड़े गठबंधनों के कमजोर पड़ने से तीसरे मोर्चे जैसी कोई स्थिति बन सकती है। यदि ऐसी स्थिति बनती है तो सपा, बसपा के नेताओं को दिल्ली में शीर्ष पद के लिए अपनी संभावना भी दिखाई देती है। इसी संभावना ने सियासत गरमा दी है।

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