बतौर पीएम उपलब्धियां भी हैं
प्रधानमंत्री के रूप में शायद डॉ. मनमोहन सिंह की यह आखिरी प्रेस कान्फ्रेंस हो और ऐसा नहीं भी हो सकता। भविष्य को भला किसने ठीक ढंग से बांचा है, सभी अनुमान के इर्द-गिर्द परिक्रमा लगाते रहते हैं। जहां तक बतौर प्रधानमंत्री सिंह के इस दूसरे कार्यकाल की बात है तो यह कहना आसान है कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में बड़े-बड़े घोटाले हुए और उसमें प्रथम दृष्ट्या आरोपी मंत्रियों पर सम्यक कार्रवाई करने के बजाय, पक्ष में तब तक खड़े दिखाई दिये, जब तक सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा संदेश नहीं दिया। डॉ. सिंह की भूमिका के उस उलझन को भी समझा जा सकता है, जिसमें खुद वह ईमानदार हैं लेकिन उनके पीएमओ पर भ्रष्टाचार के छींटे पड़े। टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन और कोल ब्लाक को लेकर सीधे तौर पर घिरे सिंह साहब की त्रासदी यह है कि उनकी सादगी और ईमानदारी पर विपक्ष को भी कोई शक नहीं। लेकिन पीएम के तौर पर उन्हें इस तरह के सारे आरोपों से दो-चार होने की क्या मजबूरी रही होगी, इसे चुटकियों में नहीं समझा जा सकता। कई बार उनके पद की गरिमा से जाने-अनजाने खिलवाड़ भी हुआ लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिवाद नहीं हुआ। सजायाफ्ता माननीयों की सदस्यता रद्द करने के मामले मे कैबिनेट के रुख के विपरीत राहुल गांधी की सार्वजनिक हुंकार को भले ही पीएम के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण समझा गया हो अथवा किसी सीमा तक असम्मान माना गया हो लेकिन पीएम की खामोशी के गर्द में अप्रत्याशित घटना ज्यादा विस्तार नहीं पा सकी। इसे विरोधी पीएम की ‘मजबूरी’ कहते हैं तो कुछ इसे 10 जनपथ के प्रति वफादारी बताते हैं। लेकिन जो भी हो एक प्रधानमंत्री के रूप में नाकाम साबित हुए डॉ. सिंह को उनकी व्यक्तिगत छवि के लिए नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यह उनकी खासियत है और अवधारणा कुछ वर्षों में नहीं बनी है। डॉ. सिंह प्राध्यापक, रिजर्व बैंक के गर्वनर और देश के वित्त मंत्री की भूमिका से लेकर प्रधानमंत्री के रूप में कभी निजी तौर पर विवादित नहीं रहे। भरोसे के आदमी रहे, इसीलिए पीएम का दूसरा कार्यकाल भी कुछ महीनों में पूरा करने जा रहे हैं। डॉ. सिंह के कार्यकाल में जहां तक स्त्री सुरक्षा, जमीन और भ्रष्टाचार से लेकर लोकपाल बिल तक की मंजूरी के सवाल हंै तो इसका दूरगामी असर पड़ेगा। यौन हिंसा पर नये कानून को लेकर एक ऐसा माहौल जरूर बनेगा, जिसमें स्त्रियां अपनी निजता के साथ आने वाले वर्षों में खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करेंगी। जमीन अधिग्रहण कानून के बाद किसानों को अब मुआवजे को लेकर अफसोस नहीं जताना पड़ेगा और लोकपाल भी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में काफी हद तक कामयाब होता दिखेगा। अब अपराध से जुड़ने अथवा उसे बढ़ावा देने में ‘माननीय’ भी डरेंगे। जनसूचना के अधिकार ने पूरा परिदृश्य बदल कर रख दिया है। यह सब कुछ पीएम होने के नाते डॉ. सिंह के खाते में ही जाएगा। तो जहां सिर्फ भ्रष्टाचार की चर्चा होगी वहां उसमें संलिप्त लोगों पर कोर्ट के निर्देश पर ही सही, कार्रवाई की भी चर्चा होगी। एक बात और, पीएम ने अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में लोकसभा चुनाव का एजेण्डा भी साफ कर दिया, कहा कि नरेन्द्र मोदी यदि पीएम बने तो देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। हालांकि अगले गठबंधन की सरकार उन्होंने यूपीए की अगुवाई में बनने की संभावना जताई है। फिलहाल, जिस तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पीछे कांग्रेस खड़ी दिखाई देती है, उससे साफ है कि 128 वर्ष पुरानी यह पार्टी केन्द्र में भाजपा की ताजपोशी रोकना चाहती है, इससे पहले दिल्ली विधानसभा में यह ‘करिश्मा’ हो चुका है। वाकई कांग्रेस अपने खिलाफ उठे गुबार को भी बांटना जानती है।
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