सुनंदा का जाना...
मनमोहन सरकार के मानव संसाधन मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की एक होटल में हुई मौत ने कई सवाल खड़े किये हैं। हालांकि थरूर और सुनंदा की यह तीसरी शादी थी। यह भी कि पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के शशि थरूर से कथित रिश्ते को सुनंदा काफी परेशान चल रहीं थीं। उन्होंने सोशल मीडिया में ट्वीट कर बताया था कि वह अपने और थरूर के बीच किसी तीसरे को नहीं आने देंगी। यह भी कि इसके बाद सोशल मीडिया में यह खबर आग की तरह फैल गई थी। आखिरकार शशि थरूर से अपने वैवाहिक रिश्तों को लेकर सुनंदा ने फिर ट्वीट करके बताया कि ‘आल इज वेल’। उनकी शादी ठीक-ठाक चल रही है और वे दोनों ठीक हैं। लेकिन इसी शुक्रवार को जब तालकटोरा स्टेडियम में आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी की कान्फ्रेंस चल रही थी तब दिल्ली के ही होटल में सुनंदा मरी पाई गयीं। इससे पिछले दिनों की ट्वीट और उससे जुड़ी बातें एक बार फिर ताजा हो गयीं। हालांकि तरार ने ट्वीट किया ‘ओह माई गॉड, व्हाट दि हेल!’ फिर भी यह सवाल तो है कि जब सब कुछ ठीक चल रहा था तो वह होटल में क्यों रूक रही थीं? और फिर ऐसा क्या हो गया कि उनकी मौत हो गयी। जवाब तो देश को चाहिए ही। मामला शशि थरूर से जुड़ा है, इसलिए भी। वास्तविकता तो देर-सवेर सामने आ ही जाएगी। फिर भी ऐसी घटनाएं चिंतित और दुखी दोनों करती हैं। चिंतित इसलिए कि हाईप्रोफाइल सोसाइटी में जहां महिलाएं प्राय: पराश्रित नहीं होती, वहां ऐसी संदिग्ध मौतें बेशक सवाल के रूप में सामने आती हैं। क्यों समर्थ महिलायें ‘वो’ फैक्टर के आगे निरूपाय और नि:सहाय हो जाती हैं, उन्हें तो डटकर आसन्न चुनौतियों का सामना करना चाहिए। समर्थ महिलायें तो बाकी महिलाओं के लिए प्रेरणास्पद होती हैं। नारी सशक्तिकरण के इस दौर में जहां स्त्रियोचित संवेदना को मुखर-प्रखर बनाने की दिशा में संवैधानिक स्तर पर भी प्रयास चल रहे हैं, वहां कोई भी महिला उपेक्षात्मक एकान्त का दंश क्यों झेले? ऐसे में पावरफुल महिला की ‘पीड़ित छवि’ हमारे प्रयासों की वास्तविकता को सामने ला देती है। सुनंदा का शनिवार की शाम बेशक अंतिम संस्कार हो गया लेकिन इस तरह से जाने को लेकर सवाल तो उठते रहेंगे ही।भले ही उन सवालों के आईने में बाद में कोई संवैधानिक पहल न हो लेकिन सोचने के लिए ऐसी घटना विषय-वस्तु के रूप में स्मृतियों में बनी रहेगी। इसलिए भी कि अधकचरे मूल्यों के साथ जीने के चलते हम वास्तविकता का सामना करने से घबरा जाते हैं। और यही अवसाद के रूप में हमारी जिंदगी की लौ बुझा देता है। इसीलिए इस तथ्य को नहीं भूला जाना चाहिए कि पूर्वी संस्कृति में रिश्तों को वार्डरोब की शोभा बनाकर नहीं रहने दिया जाता बल्कि पूरे तन-मन से जीया जाता है। यही विशिष्टता हमें एकनिष्ठ बनाती और जीवन को कलात्मक ढंग से जीना सिखाती है। उम्मीद की जानी चाहिए ऐसी घटनाएं न के बराबर हों तो रिश्तों में विश्वास की महक बनी रहेगी।
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