साथ चलने का लें संकल्प
गणतंत्र दिवस की कोई प्रासंगिकता हो सकती है तो वह मात्र यही कि हम सहमतियों-असहमतियों के साथ मिलकर आगे बढ़ने का संकल्प लें। संवाद बनाये रखें। एक-दूसरे की निजता को सम्मान देते हुए अपने-अपने क्षेत्र में विकास का शिखर बनायें। वैश्विक परिदृश्य में हमें अपनी ब्रांडिंग करने की नये सिरे से आवश्यकता है, तभी मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के सपने को जमीन मिल सकती है। तभी सामाजिक क्षेत्र में भी एक आधुनिक पहचान बन सकती है। इसके लिए जातीय आग्रहों से मुक्त कर दे, ऐसी कोई सर्वसम्मत प्रविधि को विकसित किया जाना जरूरी है। इसका 21वीं सदी के ‘किशोर काल’ में जो अभाव दिख रहा है, वह चिंतित करता है। यह सदी की तरूणाई ऊर्जा से भरी हुई है, इसका सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए भी कि सौभाग्य से देश की 65 फीसदी आबादी युवा है। बदलाव के लिए अनुकूल समय है। खुद स्वामी विवेकानन्द का भी पूरा जोर युवाओं पर ही था। नदी की मूल प्रच्छन्न धारा अपेक्षाकृत धवल और प्रभावी होती है। इसीलिए उसको लेकर जो आशा होती है, वह बाद के पड़ावों पर नहीं होती। यह हम सभी महसूस करते हैं और मानते भी हैं कि प्रगति की धीमी रफ्तार के पीछे हमारी ‘पहचान की पीड़ा’ बड़ा व्यवधान है, जो इस कदर मन पर हावी होती है कि साथ-साथ चलने और कार्य करने का माहौल सृजित ही नहीं हो पाता। जरूरत समवेत सहयोग और सौहार्द को श्रेय देने की है। गणतंत्र दिवस पर यह संकल्प दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। यह संकल्प ही राज्यों के बीच पानी के बंटवारे और दूसरे संसाधनों से जुड़े विवाद या फिर संवैधानिक अधिकारों को लेकर प्राय: होती तनातनी को हाशिये पर डाल सकता है। आइये, आधी आबादी को उसकी निजता और गरिमा के साथ स्वीकारने का संकल्प लें ताकि विकास का पहिया घर-बाहर बड़ी तेजी से दौड़ सके। जेण्डर मुद्दों पर हमारे समाज में सदियों से जो जड़वादी दृष्टिकोण रहा है, उसमें परिवर्तन की आवश्यकता है। महिलाएं अपना अधिकार मांग रही हैं। वे अपना स्थान मांग रही हैं। वे दया के भाव पर सहयात्री नहीं बने रहना चाहतीं। उनका आक्रोश अब पक चुका है इसे जानने और स्वीकारने का गणतंत्र दिवस से बेहतर अवसर और क्या हो सकता है।
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