Wednesday, 19 March 2014

                            ‘आप’इतना गुस्से में क्यों

भारतीय जनतांत्रिक व्यवस्था में स्थापित सरकारों द्वारा हाशिये पर डाल दी गयी जनता ने जो आक्रोश जब-तब व्यक्त किया, उसकी परिणति के रूप में हमें जिस नये दल का परिचय प्राप्त हुआ, वह है आम आदमी पार्टी ‘आप’। यह कांग्रेस पार्टी का भी प्रिय मुहावरा रहा है। आम आदमी की सियासत का अर्थ साफ-सुथरी व्यवस्था होना चाहिए लेकिन जो परिदृश्य बीते कुछ महीनों से आम आदमी के नाम पर उभर रहा है, वह चिंतित करने लायक है। सोचिये, हम सभी भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त हैं। अदालतों की बढ़ती सक्रियता के बावजूद बहुत कुछ ऐसा है, जिसे बदले जाने की अपरिहार्य आवश्यकता है। दूसरी संवैधानिक व्यवस्थाएं तो आपात भूमिका निभाती हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि जब किसी मुद्दे पर जटिलता बढ़ जाये तब हमें उसके नये पाठ और भाष्य की आवश्यकता होती है। वैसे तो राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था के ही जिम्मे होती है जनचर्या। इसलिए राजनीतिक व्यवस्था से ही मूल अपेक्षा होती है। यही कारण रहा कि स्थापित दलों की ‘बांटो और राज करो’ की राजनीति से जब जनता परेशान हुई तो उसने नये दल के रूप में आम आदमी पार्टी को बड़ी उम्मीद से हाथों-हाथ लिया। एकबारगी लगा कि सारी समस्याओं का अंत हो जाएगा। लम्बा-चौड़ा वादा भी तो ‘आप’ की तरफ से हुआ था। बिजली के दामों में कमी से दिल्लीवासियों को एक नये संकट से रूबरू होना पड़ रहा है, निजी कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया है, फिर भी व्यापार के मूलभूत नियमों से ज्यादा देर तक छेड़छाड़ नहीं हो सकती। घाटे पर कैसे कोई बिजली मुहैया करा सकता है। भ्रष्टाचार और महंगाई के अन्तर्संबंध को समझा जा सकता है लेकिन इसके लिए किसी के आधारभूत ढांचे से खिलवाड़ नहीं होने दिया जा सकता है। लेकिन दिल्ली की मौजूदा सरकार के मुखिया अरविन्द केजरीवाल जानबूझकर संवैधानिक संकट को बढ़ाने संबंधी स्थितियां पैदा कर रहे हैं, वह एकबारगी तो हैरत में डालता है लेकिन ठहर कर सोचिये तो साफ पता चलता है कि केजरीवाल अपने वायदों की जमीनी सच्चाई से अवगत होने के बाद अब अपनी बचत के लिए सुरक्षित गलियारा तलाश रहे हैं। जनलोकपाल का मुद्दा उन्हें जनाक्रोश से बचा जा सकता है। इसीलिए मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी संवैधानिक सीमाओं को जानने के बावजूद ललकार रहे हैं। उन्हें पता है, जन लोकपाल बिल जिस धरातल पर वह लाना और पारित कराना चाहते हैं, संघीय व्यवस्था में अमान्य और अव्यवहारिक है। जिस तरह संविधान के जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं, ऐसे में जिस भाषा का इस्तेमाल हो रहा है वह किसी भी दृष्टि से वाजिब नहीं है। ऐसा नहीं है कि उन्हें इसका अहसास नहीं है, जानते हुए भी मर्यादा का निरंतर उल्लंघन किया जा रहा है। इसके पीछे सारी कवायद अपनी जिम्मेदारियों से बचने की है। इसके अलावा आगामी आम चुनाव को लेकर अपनी स्थिति को मजबूत बनाने की भी है। इसीलिए उन्हें हर हाल में चर्चा चाहिए।

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