हाय, हाय ये महंगाई...
आम चुनाव तक महंगाई रूलाती रहेगी, इसमें दो राय नहीं। हालांकि इस बीच मनमोहन सरकार ने गृहणियों को रसोई गैस सिलेण्डरों की तादाद 12 करके राहत जरूर दी है। यह सियासी फैसला चुनाव बाद यथावत रहता है, इसमें संदेह है। क्योंकि सब्सिडी के इस ताजा फैसले से तेल कंपनियों पर पांच हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। फिलहाल तो सियासी दलों को वोट की पड़ी है। तभी तो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कह दिया कि हर परिवार को 24 गैस सिलेंडर मिलने चाहिए। यहीं पर नहीं रूके, उन्होंने गरीब परिवारों को फ्री में गैस मुहैया कराने का सुझाव दे दिया। लेकिन विसंगति देखिये, उत्तर प्रदेश में गुपचुप बिजली की कीमतें बढ़ाने की तैयारी चल रही है। पानी का दाम भी कई गुना बढ़ाये जाने की चर्चा है। हो सकता है, इस पर आम चुनाव तक अमल न हो। लेकिन इतना साफ है कि महंगाई बेलगाम हो रही है। खुद महंगाई के खिलाफ व्यापक आंदोलन छेड़ने वाले अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने के बाद खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। बिजली कंपनियों ने हाथ-खड़े कर दिए और अब दिल्ली वासियों को सरचार्ज के रूप में बिजली के लिए बढ़े दाम देने पडंÞेगे। आठ फीसदी सरचार्ज लगने से यह स्थिति पैदा हुई है। इसमें तिमाही वृद्धि भी होगी। इस नयी परिस्थिति से दिल्ली में राजनीतिक भूचाल भी आ गया है। भाजपा ने ‘आप’ सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस इतने में खुश है कि अब केजरीवाल को आटे-दाल का भाव पता चल रहा होगा। यह तो सियासी बात हुई। इसके मूल में जाएं तो पता चलेगा कि असली कारण क्या है। असली सवाल महंगाई का नहीं है। असली सवाल तो क्रयशक्ति से जुड़ा है। जो देश में कामगारों के वेतन के मौजूदा ढांचे हैं उससे भला कोई कैसे महंगाई से निपट सकता है। कुछ चार-पांच फीसदी सरकारी कर्मचारियों को छोड़ दें तो असंगठित क्षेत्र की व्यापक जनसंख्या रामभरोसे है। योजना आयोग के आंकड़े भी इस बात के गवाह हैं कि प्रति व्यक्ति 20-30 रुपये पर रोजाना गुजारा करते हैं। उनके लिए महंगाई कितनी घातक है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सियासी दलों के लिए महंगाई चुनौती नहीं, बल्कि चुनावी जीत का हथियार साबित हुई है। यही वजह है कि जो भी दल सत्ता से बाहर होता है उसकी पूरी राजनीति इसी के ईर्द-गिर्द केन्द्रित रहती है। जनता पार्टी के जमाने में मोरारजी भाई की सरकार का पतन प्याज की बढ़ी कीमतों के कारण हुआ था। इससे पूर्व पहली बार सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस ढाई साल भीतर सत्ता में वापसी कर चुकी थी। पिछले दिनों भी दिल्ली समेत पूरे देश में महंगाई के नाम पर जबर्दस्त राजनीति हुई। लेकिन इससे निपटने की सरकार के स्तर पर तनिक भी ईमानदार कोशिश नहीं दिखाई दी। कारण और जिम्मेदारी वैश्विक परिस्थितियों पर डाले जाने की चेष्टा होती रही। खुद महंगाई को लेकर लाल हुई दिल्ली ने राहत के लिए केजरीवाल के हाथ को मजबूत किया तो अब वहां से भी इस सवाल पर ठोस समाधान मिलने की उम्मीद कम दिखाई देती है। सख्त तेवरों के बावजूद बिजली कंपनियां घाटे में अब और सेवाएं देने को राजी नहीं हैं।
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