Wednesday, 19 March 2014

                                     एक मिथक का टूटना

हमारे दौर की समृद्धि का सूत्र ‘ब्राडिंग’ है। जो इस कला में निपुण हुआ उसके तो वारे-न्यारे हो गये। इसीलिए इस खेल में पैकेजिंग, प्रोपेगेण्डा को किसी भी उत्पाद की गुणवत्ता के तौर पर स्वीकृति मिल जाती है। फिर कोई उस उत्पाद की तह तक जाने की कोशिश नहीं करता अपितु उसी चमक-दमक के बलबूते पहली पसंद बनी रहती है। यह खेल अरबों-खरबों का है। पश्चिम के बाजारवाद से आया ब्रांडिंग का जिन्न कमोडिटी तक कैसे सीमित रहता, इसने व्यक्ति की भी ब्रांडिंग करनी शुरू कर दी। सेल्युलाइड इमेज या कहें रील इमेज, इसी के दम पर तो दर्शक थियेटर या मल्टीप्लेक्स तक खिंचे चले जाते हैं। पर्दे पर छवियों के गढ़े जाने का यह खेल ‘पर्सनालिटी ग्रूमिंग’ तक पहुंच गया। इस धंधे में कई राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियां हैं, जो किसी को भी अतिमानवी बनाने का उपक्रम रचती हैं। ऐसी कई सूचनाएं जब-तब  सुर्खियां पाती रही हैं जिसमें कई बड़े चेहरे अपनी ‘आभा’ खोते मिले हैं। ब्रांडिंग के दौर में वैश्विक धरातल पर कइयों का मिथक टूटा है। वास्तव में समय ही ताकतवर होता है। उसके आगे सभी बौने होते हैं। एक बार फिर समय का महत्व प्रतिष्ठित हुआ है। इस तरफ एक ताजा घटना ने ध्यान खींच लिया। जाने-माने एक उद्योगपति, जिन्हें इण्डिया टुडे के विशेष अंक में, मुगल सम्राट बताया गया था यानि प्रभावशाली व्यक्तियों में उन्हें शुमार किया गया था। एक ऐसा शख्स जिसकी दुनिया के सेलिब्रिटीज से गहरी यारी है, एक ऐसा शख्स जिसके बेटे की शादी में अपने-अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोग शिरकत करते हैं, एक ऐसा शख्स जिसे अब तक यह माना जाता रहा है कि वह रसूखदार हैं, ताकतवर है, उन्हें कोई छू नहीं सकता। उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इस शख्स पर 20 हजार करोड़ रुपये अपने निवेशकों को लौटाने के लिए जब सेबी द्वारा कहा गया, तब लगा कि इस ताकतवर व्यक्ति की कहीं जवाबदेही भी हो सकती है। हालांकि सेबी के निर्देशों की अवहेलना के बाद बात जब अदालत की चौखट तक गयी और वहां से आदेश हुआ कि निवेशकों को पैसे लौटाने ही होंगे। इस तल्खी के बाद भी जब कार्यान्वयन नहीं हुआ तब बात गैरजमानती वारंट तक पहुंची और अब वह मिथक गिरफ्तारी के बाद टूट गया।
ताकतवर होने का मिथक टूटने के कुछ अर्थ ऐसे भी हैं, जो समृद्धि के धावक हैं, उन्हें समझने के लिए यह घटना अन्तर्दृष्टि प्रदान करती है। हमें अपने सपनों को जमीन देने के उपक्रम में कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे भी कुछ पाने की दौड़ में हैं। हमारा विस्तार उनके हिस्से को लील न जाये, यह याद रखा जाना चाहिए। जब इसका अतिक्रमण होता है तब जवाब देना पड़ता है। दरअसल बाजारवाद ने आसमान नापने के चक्कर में जो समृद्धि की अपनी नैतिकता है, उसको बिसरा दिया है। जब तक कानून से आंख-मिचौली संभव बन पड़ती है, तब तक बाजारवादी मानसिकता खामोशी ओढ़े रहती है। लेकिन एक समय के बाद चीजें जब हद से बाहर हो जाती हैं तब टूटती है खामोशी। और फिर स्वाभाविक है मिथक भी टूटता है। इस प्रकरण में यही हुआ है।

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