आगे बढ़ने का वक्त
शोर-शराबा, हंगामा और तगड़े विरोध के बावजूद अलग तेलंगाना राज्य के गठन का विधेयक राज्यसभा में भी पास हो गया। अब यह तय है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले तेलंगाना देश का 29वां राज्य बन चुका होगा। इसके गठन की प्रक्रिया में संसद में जिस तरह का माहौल बना और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को जैसी घटनाओं का गवाह बनना पड़ा, वह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन इस सबके बावजूद इस अहम बिल को संसद से पास कराने में सत्तारूढ़ कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने अंतत: जिस समझदारी और जिम्मेदारी का परिचय दिया, उसका स्वागत होना चाहिए। अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर उस क्षेत्र के लोगों में इस कदर तीव्र भावनाएं बन चुकी थीं कि इसे और लटकाना उनके साथ ज्यादती होती। बेशक कांग्रेस इस नए राज्य के गठन का श्रेय ले रही है, और यह गलत भी नहीं है, लेकिन हकीकत यही है कि उसने लंबे समय तक इस मांग को लटकाए रखा। पार्टी खुद को अलग तेलंगाना राज्य के पक्ष में दिखाने की कोशिश काफी पहले से करती रही है।2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ गठबंधन इसी आश्वासन के आधार पर किया था। मगर, यूपीए-एक के पहले कार्यकाल में तो उसने इस सवाल को टाल ही दिया, यूपीए-दो के दौरान भी वह इसे ठंडे बस्ते में डाले रही। जब कार्यकाल समाप्त होने को आया तब जाकर लोकसभा में इस बिल को पेश और पास किया गया। इस टालू नुस्खे की राजनीतिक बनावट समझना मुश्किल नहीं है। बिल को पेश करने के बाद जिस तरह का विरोध संसद में देखने को मिला, वह बताता है कि बिल जल्दी लाने का मतलब कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश के अलावा केंद्र की सरकार से हाथ धो बैठना ही होता। उसके मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी अलग तेलंगाना के विरोध में न सिर्फ सरकार से बल्कि पार्टी से भी इस्तीफा दे चुके हैं और पिछले कुछ दिनों में सीमांध्र से आए उसके सभी सांसद, यहां तक कि कई केंद्रीय मंत्री भी पार्टी से ज्यादा से ज्यादा दूरी दिखाने का प्रयास करते दिखे हैं। बहरहाल, अब इस बिल के कानून बनने में महज एक-दो औपचारिकताएं ही शेष हैं। आंध्र प्रदेश के विभाजन का विरोध कर रहे लोगों की भावनाएं समझी जा सकती हैं। मगर, सच्चाई यही है कि सीमांध्र इलाका किसी भी लिहाज से वंचित नहीं कहा जा सकता। तेलंगाना की तुलना में उसकी समृद्धि और समृद्धि के स्रोत दोनों बरकरार हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार ने सीमांध्र को विशेष पैकेज देने की भी घोषणा कर दी है। इसलिए बेहतर होगा कि तेलंगाना गठन का विरोध कर रहे लोग अब अपनी ऊर्जा सीमांध्र को विकास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में करें ताकि तेलंगाना समेत बाकी सभी राज्य उसे अपने आदर्श के रूप में स्वीकार करें। जहां तक अन्य राज्यों के गठन से जुड़ी मांगों का सवाल है तो इसमें दो राय नहीं कि तेलंगाना के बाद वे और जोर पकड़ेंगी। तर्कसंगत यही होगा कि इन मांगों के खतरनाक रूप लेने का इंतजार किए बगैर राज्य पुनर्गठन आयोग की दिशा में कदम बढ़ा दिए जाएं।
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