Wednesday, 19 March 2014

                                        आप ऐसे तो न थे

भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी के त्वरित उभार ने जिस तरह से सियासी मनीषियों को चौंकाया था, ठीक उसी तरह इतने कम समय में भारी-भरकम विसंगतियां भी चौंका रही हैं। इन दो चौंकाने वाली स्थितियों में फर्क बस इतना है कि अब यह चौंकाने वाला प्रकरण ‘बदलाव की राजनीति’ के द्वार फिलहाल तो बंद करता दिख रहा है। दिल्ली विधानसभा में 28 सीटों से भरोसा जगा था कि आम चेहरे भी सत्ता की सीढ़ियां साफ-सुथरे तरीके से चढ़ सकते हैं। उम्मीद यह भी तब बलवती हुई थी कि भ्रष्टाचार के मुहाने बंद किये जा सकते हैं। लेकिन जिस तरह दो महीने के भीतर सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप को प्राथमिकता मिलती देखी गयी और कई मोर्चांे पर अन्तर्विरोध फूटते देखे गये तो मोहभंग भी होना शुरू हो गया। अब तो हद हो गयी यह ‘नया उभार’ सिफ हां में हां मिलाते हुए मीडिया को भी देखना चाहता है। जो ऐसा न करे उसे लॉकअप में भेजने की मंशा व्यक्त की जाती है। यह नया चेहरा देश का चेहरा बनना चाहता है। पर सवाल अहम ये है कि विद्वेष और घृणा की सियासत करके क्या कोई बदलाव लाया जा सकता है? इतिहास के पास भी ऐसा कोई चरित्र उपलब्ध नहीं है। सभी बुरे हैं, हां वे जरूर अच्छे हैं जो हमारी राय से इत्तेफाक रखते हैं। यह ‘राय’ क्या है, इस बारे में कोई स्पष्ट अवधारणा भी अब तक संज्ञान में नहीं है। सत्ता मिलने पर पार्टी की क्या नीतियां होंगी, देश को विकास के रास्ते पर कैसे आगे ले जाएंगे या फिर सवा अरब के इस 65 फीसदी युवा के सपनों को कहां से पंख मुहैया कराएंगे आदि-आदि जैसे ढेरों सवाल हैं जिसका इस ‘स्वयंभू नेतृत्व’ के पास जवाब नहीं है। लेकिन मीडिया का तो काम ही है सवाल पूछना। चार्टर्ड प्लेन से क्यों गये गुजरात? मुबंई रेलवे स्टेशन पर आप के समर्थकों ने पब्लिक प्रापर्टी को नुकसान क्यों पहुंचाया? डिनर के नाम पर प्रति व्यक्ति 10 हजार रुपये क्यों लिए गये? और आखिरी सवाल उद्योगपतियों को निशाना बनाकर कहां से खड़ा करेंगे औद्योगिक संजाल? तो क्या सिर्फ एनार्की फैलाना चाहते हैं? हालांकि यह नेतृत्व खुद को एनार्किस्ट कहने में गर्व महसूस करता है। वैसे हाल के घटनाक्रमों से इतना तो साफ हो गया है कि ऐसे पल-पल बदलते नेतृत्व को देश की कमान दिये जाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। यही कारण है कि कई साथी रहे लोग अब किनारा करने लगे हैं।
कहा भी जाता है कि कोई भी विकास तब ही स्वागत योग्य एवं दीर्घजीवी होता है जब वह मंथर गति से होता है। द्रुत गति का विकास जल्दी ही पराभव की तरफ भी ले जाता है। इस नये किरदार के साथ यही हुआ है।

                                 दिल्ली वाया अहमदाबाद

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को खबरिया चैनलों में बहस का रुख तय करने की कला बखूबी आती है। एक साल पहले जनलोकपाल को लेकर जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन चल रहा था, समाजसेवी अन्ना हजारे के साथ केजरीवाल भी भूख हड़ताल पर बैठे हुए थे, तब किसी के जेहन में यह नहीं था कि जो कुछ हो रहा है उसके पीछे कोई सोची-समझी रणनीति भी है। किंतु आंदोलन के बैकफुट पर जाने के बाद जब आम आदमी पार्टी की स्थापना हुई और अप्रत्याशित ढंग से ‘आप’ को दिल्ली विधानसभा में 28 सीटें प्राप्त हुर्इं तब साफ हो गया कि जो कुछ घटित हुआ वह अप्रत्याशित नहीं, अनुमानित था। कांग्रेस को पानी पी-पी कर उल्टा-सीधा कहने वाले आप नेता ने उस पार्टी के आठ विधायकों की मदद से दिल्ली में सरकार बनायी। बिजली-पानी से जुड़े दो वादों की तरफ यह सरकार आगे बढ़ी तो लगा कार्यात्मक राजनीति की शुरुआत हो रही है। हालांकि 49 दिन के भीतर कई ऐसे प्रसंग आये जिससे यह अंदाजा लगने लगा कि केजरीवाल की नजर केन्द्र की सत्ता पर है। इसीलिए उन्होंने रणनीतिक तौर पर मुकेश अंबानी और मोदी के खिलाफ हल्ला बोल दिया। अंबानी के खिलाफ तो एफआइआर भी दर्ज करायी, यह बात और कि जनलोकपाल बिल के बहाने सत्ता छोड़ दी और लोकसभा की तैयारी में जुट गये। चूंकि लोकसभा चुनाव देश का चुनाव होता है। समय कम है तो कैसे ‘आप’ को वर्चुअल ही सही, मुख्य मुकाबले में मोदी के समकक्ष लाया जाए, इस आलोक में आसान यही था कि गुजरात जाकर मोदी को घेरा जाए। चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने पर काफिले के साथ आगे बढ़े केजरीवाल रोके गये तो दिल्ली से लेकर लखनऊ तक आप कार्यकर्ताओं ने भाजपा कार्यालयों पर हुड़दंग मचाया। इस तरह मोदी को घेरने की कोशिश हुई। ठीक इसके बाद इच्छा हुई कि मोदी से सवाल पूछे जायें तो 16 सवाल भी तैयार कर लिए। उनसे मिलना चाहा, नहीं मिल पाये तो उसे भी राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की। हालांकि कई चैनलों पर उन्हीं को लेकर बहस केंद्रित रही। लेकिन समय के साथ दो बातें साफ होती जा रही हैं। पहली, अपनी कमजोर स्थिति को भांपते हुए कांग्रेस की पूरी कोशिश मोदी को केन्द्र में परचम लहराने से रोकने की है। इसके लिए ‘आप’ पर कांग्रेस मेहरबान भी दिखाई दे रही है। गुजरात प्रकरण पर कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता ने केजरीवाल के सुविचारित आचरण की आलोचना नहीं की। इसके अलावा दूसरी बात केजरीवाल जानते हैं कि मोदी के बहाने यदि बात जम गयी तो उनके लिए दिल्ली दूर नहीं है। वैसे जनतंत्र में कुछ भी हो सकता है इसलिए इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। लेकिन सच यह भी है कि लोकसभा चुनाव का दायरा बड़ा होता है। लहरें कितनी भी घनी हों, लंबी दूरी में विरल हो  जाती हैं। उन्हें मजबूती के लिए किनारा चाहिए होता है। व्यापक सांगठनिक ढांचा ही यह प्रभाव बचाये रख पाता है।

                                     एक मिथक का टूटना

हमारे दौर की समृद्धि का सूत्र ‘ब्राडिंग’ है। जो इस कला में निपुण हुआ उसके तो वारे-न्यारे हो गये। इसीलिए इस खेल में पैकेजिंग, प्रोपेगेण्डा को किसी भी उत्पाद की गुणवत्ता के तौर पर स्वीकृति मिल जाती है। फिर कोई उस उत्पाद की तह तक जाने की कोशिश नहीं करता अपितु उसी चमक-दमक के बलबूते पहली पसंद बनी रहती है। यह खेल अरबों-खरबों का है। पश्चिम के बाजारवाद से आया ब्रांडिंग का जिन्न कमोडिटी तक कैसे सीमित रहता, इसने व्यक्ति की भी ब्रांडिंग करनी शुरू कर दी। सेल्युलाइड इमेज या कहें रील इमेज, इसी के दम पर तो दर्शक थियेटर या मल्टीप्लेक्स तक खिंचे चले जाते हैं। पर्दे पर छवियों के गढ़े जाने का यह खेल ‘पर्सनालिटी ग्रूमिंग’ तक पहुंच गया। इस धंधे में कई राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियां हैं, जो किसी को भी अतिमानवी बनाने का उपक्रम रचती हैं। ऐसी कई सूचनाएं जब-तब  सुर्खियां पाती रही हैं जिसमें कई बड़े चेहरे अपनी ‘आभा’ खोते मिले हैं। ब्रांडिंग के दौर में वैश्विक धरातल पर कइयों का मिथक टूटा है। वास्तव में समय ही ताकतवर होता है। उसके आगे सभी बौने होते हैं। एक बार फिर समय का महत्व प्रतिष्ठित हुआ है। इस तरफ एक ताजा घटना ने ध्यान खींच लिया। जाने-माने एक उद्योगपति, जिन्हें इण्डिया टुडे के विशेष अंक में, मुगल सम्राट बताया गया था यानि प्रभावशाली व्यक्तियों में उन्हें शुमार किया गया था। एक ऐसा शख्स जिसकी दुनिया के सेलिब्रिटीज से गहरी यारी है, एक ऐसा शख्स जिसके बेटे की शादी में अपने-अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोग शिरकत करते हैं, एक ऐसा शख्स जिसे अब तक यह माना जाता रहा है कि वह रसूखदार हैं, ताकतवर है, उन्हें कोई छू नहीं सकता। उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इस शख्स पर 20 हजार करोड़ रुपये अपने निवेशकों को लौटाने के लिए जब सेबी द्वारा कहा गया, तब लगा कि इस ताकतवर व्यक्ति की कहीं जवाबदेही भी हो सकती है। हालांकि सेबी के निर्देशों की अवहेलना के बाद बात जब अदालत की चौखट तक गयी और वहां से आदेश हुआ कि निवेशकों को पैसे लौटाने ही होंगे। इस तल्खी के बाद भी जब कार्यान्वयन नहीं हुआ तब बात गैरजमानती वारंट तक पहुंची और अब वह मिथक गिरफ्तारी के बाद टूट गया।
ताकतवर होने का मिथक टूटने के कुछ अर्थ ऐसे भी हैं, जो समृद्धि के धावक हैं, उन्हें समझने के लिए यह घटना अन्तर्दृष्टि प्रदान करती है। हमें अपने सपनों को जमीन देने के उपक्रम में कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे भी कुछ पाने की दौड़ में हैं। हमारा विस्तार उनके हिस्से को लील न जाये, यह याद रखा जाना चाहिए। जब इसका अतिक्रमण होता है तब जवाब देना पड़ता है। दरअसल बाजारवाद ने आसमान नापने के चक्कर में जो समृद्धि की अपनी नैतिकता है, उसको बिसरा दिया है। जब तक कानून से आंख-मिचौली संभव बन पड़ती है, तब तक बाजारवादी मानसिकता खामोशी ओढ़े रहती है। लेकिन एक समय के बाद चीजें जब हद से बाहर हो जाती हैं तब टूटती है खामोशी। और फिर स्वाभाविक है मिथक भी टूटता है। इस प्रकरण में यही हुआ है।

                                         आगे बढ़ने का वक्त

शोर-शराबा, हंगामा और तगड़े विरोध के बावजूद अलग तेलंगाना राज्य के गठन का विधेयक राज्यसभा में भी पास हो गया। अब यह तय है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले तेलंगाना देश का 29वां राज्य बन चुका होगा। इसके गठन की प्रक्रिया में संसद में जिस तरह का माहौल बना और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को जैसी घटनाओं का गवाह बनना पड़ा, वह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन इस सबके बावजूद इस अहम बिल को संसद से पास कराने में सत्तारूढ़ कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने अंतत: जिस समझदारी और जिम्मेदारी का परिचय दिया, उसका स्वागत होना चाहिए। अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर उस क्षेत्र के लोगों में इस कदर तीव्र भावनाएं बन चुकी थीं कि इसे और लटकाना उनके साथ ज्यादती होती। बेशक कांग्रेस इस नए राज्य के गठन का श्रेय ले रही है, और यह गलत भी नहीं है, लेकिन हकीकत यही है कि उसने लंबे समय तक इस मांग को लटकाए रखा। पार्टी खुद को अलग तेलंगाना राज्य के पक्ष में दिखाने की कोशिश काफी पहले से करती रही है।
2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ गठबंधन इसी आश्वासन के आधार पर किया था। मगर, यूपीए-एक के पहले कार्यकाल में तो उसने इस सवाल को टाल ही दिया, यूपीए-दो के दौरान भी वह इसे ठंडे बस्ते में डाले रही। जब कार्यकाल समाप्त होने को आया तब जाकर लोकसभा में इस बिल को पेश और पास किया गया। इस टालू नुस्खे की राजनीतिक बनावट समझना मुश्किल नहीं है। बिल को पेश करने के बाद जिस तरह का विरोध संसद में देखने को मिला, वह बताता है कि बिल जल्दी लाने का मतलब कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश के अलावा केंद्र की सरकार से हाथ धो बैठना ही होता। उसके मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी अलग तेलंगाना के विरोध में न सिर्फ सरकार से बल्कि पार्टी से भी इस्तीफा दे चुके हैं और पिछले कुछ दिनों में सीमांध्र से आए उसके सभी सांसद, यहां तक कि कई केंद्रीय मंत्री भी पार्टी से ज्यादा से ज्यादा दूरी दिखाने का प्रयास करते दिखे हैं। बहरहाल, अब इस बिल के कानून बनने में महज एक-दो औपचारिकताएं ही शेष हैं। आंध्र प्रदेश के विभाजन का विरोध कर रहे लोगों की भावनाएं समझी जा सकती हैं। मगर, सच्चाई यही है कि सीमांध्र इलाका किसी भी लिहाज से वंचित नहीं कहा जा सकता। तेलंगाना की तुलना में उसकी समृद्धि और समृद्धि के स्रोत दोनों बरकरार हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार ने सीमांध्र को विशेष पैकेज देने की भी घोषणा कर दी है। इसलिए बेहतर होगा कि तेलंगाना गठन का विरोध कर रहे लोग अब अपनी ऊर्जा सीमांध्र को विकास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में करें ताकि तेलंगाना समेत बाकी सभी राज्य उसे अपने आदर्श के रूप में स्वीकार करें। जहां तक अन्य राज्यों के गठन से जुड़ी मांगों का सवाल है तो इसमें दो राय नहीं कि तेलंगाना के बाद वे और जोर पकड़ेंगी। तर्कसंगत यही होगा कि इन मांगों के खतरनाक रूप लेने का इंतजार किए बगैर राज्य पुनर्गठन आयोग की दिशा में कदम बढ़ा दिए जाएं।

                              मिलना कोई गुनाह तो नहीं

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से भारत में अमेरिकी राजदूत नैंसी पॉवेल की मुलाकात ने सियासी तापमान अचानक बढ़ा दिया। भाजपा इसे अपनी जीत के रूप में देख रही है और कह रही है कि मोदी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर ही अमेरिका ने उनके प्रति अपनी नीति बदलने का फैसला किया है। कांग्रेस ने भी इसे गंभीरता से लिया है। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने इस मुलाकात पर आपत्ति जताते हुए अमेरिका को गुजरात दंगों की याद दिलाई और सवाल उठाया कि अमेरिका क्या कभी हॉलोकास्ट (यहूदियों के जनसंहार) को भुला सकता है? कुल मिलाकर इस मुलाकात को लेकर इतना रायता फैला कि अमेरिका को कहना पड़ा कि मोदी के प्रति उसकी वीजा नीति में कोई बदलाव नहीं होगा और पॉवेल की उनसे मुलाकात एक सामान्य शिष्टाचार भेंट भर है।            
 गौरतलब है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद से अमेरिका ने मोदी से दूरी बना रखी थी। 2005 में अमेरिकी प्रशासन ने मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया था, हालांकि इस नीति की अमेरिका में भी आलोचना होती रही है। वहां के राजनीतिक हलके में कुछ लोग मोदी को वीजा देने के पक्ष में हैं तो कुछ डटकर इसका विरोध करते हैं। वैसे राजनय का एक आम उसूल है कि कभी भी किसी पराये देश की आंतरिक राजनीति को इसका आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। ऐसा लगता है कि मोदी को वीजा न देने के पीछे अमेरिका का कोई नैतिक आग्रह नहीं था। ऐसा होता तो सुहार्तो और पिनोशे जैसे बर्बर तानाशाहों को वहां देवताओं सरीखा सम्मान नहीं मिलता। संभवत: भारत के राजनीतिक समीकरण में नरेंद्र मोदी की कमजोर स्थिति देखकर ही उन्हें वीजा न देने की नीति अपनाई गई। अभी की पहल के जरिये अमेरिका अपनी यह कूटनीतिक चूक सुधारने की प्रक्रिया में है। अमेरिका में मोदी की मुखालफत करने वाले वामपंथी रुझान के राजनेता और रूढ़िवादी क्रिश्चियन आज भी अपने रुख पर कायम हैं, लेकिन एक बड़ा वर्ग वहां यह भी मानने लगा है कि अगर मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तो अमेरिका के लिए एक विचित्र स्थिति पैदा हो जाएगी। कई अमेरिकी कंपनियां महसूस करती हैं कि भारत उनका बहुत बड़ा बाजार है और अगर मोदी के प्रति अमेरिकी सरकार की नीति नहीं बदलती है तो यहां के बाजार में यूरोपीय कंपनियां बाजी मार ले जाएंगी।
बहरहाल, यह अमेरिकी गवर्नमेंट की समस्या है कि वह भारत के किसी नेता को लेकर क्या रुख अपनाती है। हमें इसे बहुत ज्यादा तवज्जो देने की कोई जरूरत नहीं है। किसी नेता का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि विदेश में उसे किस रूप में लिया जाता है या कौनसा देश उसे लेकर क्या नीति अपनाता है। अंतत: देश की जनता ही तय करेगी कि कौन सा लीडर उसके लिए कितना उपयोगी है। बेहतर होगा कि भारत के राजनीतिक दल मोदी-नैंसी मुलाकात को ज्यादा महत्व न दें, और इसे चुनावी मुद्दा तो हरगिज न बनाएं।

                            ‘आप’इतना गुस्से में क्यों

भारतीय जनतांत्रिक व्यवस्था में स्थापित सरकारों द्वारा हाशिये पर डाल दी गयी जनता ने जो आक्रोश जब-तब व्यक्त किया, उसकी परिणति के रूप में हमें जिस नये दल का परिचय प्राप्त हुआ, वह है आम आदमी पार्टी ‘आप’। यह कांग्रेस पार्टी का भी प्रिय मुहावरा रहा है। आम आदमी की सियासत का अर्थ साफ-सुथरी व्यवस्था होना चाहिए लेकिन जो परिदृश्य बीते कुछ महीनों से आम आदमी के नाम पर उभर रहा है, वह चिंतित करने लायक है। सोचिये, हम सभी भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त हैं। अदालतों की बढ़ती सक्रियता के बावजूद बहुत कुछ ऐसा है, जिसे बदले जाने की अपरिहार्य आवश्यकता है। दूसरी संवैधानिक व्यवस्थाएं तो आपात भूमिका निभाती हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि जब किसी मुद्दे पर जटिलता बढ़ जाये तब हमें उसके नये पाठ और भाष्य की आवश्यकता होती है। वैसे तो राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था के ही जिम्मे होती है जनचर्या। इसलिए राजनीतिक व्यवस्था से ही मूल अपेक्षा होती है। यही कारण रहा कि स्थापित दलों की ‘बांटो और राज करो’ की राजनीति से जब जनता परेशान हुई तो उसने नये दल के रूप में आम आदमी पार्टी को बड़ी उम्मीद से हाथों-हाथ लिया। एकबारगी लगा कि सारी समस्याओं का अंत हो जाएगा। लम्बा-चौड़ा वादा भी तो ‘आप’ की तरफ से हुआ था। बिजली के दामों में कमी से दिल्लीवासियों को एक नये संकट से रूबरू होना पड़ रहा है, निजी कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया है, फिर भी व्यापार के मूलभूत नियमों से ज्यादा देर तक छेड़छाड़ नहीं हो सकती। घाटे पर कैसे कोई बिजली मुहैया करा सकता है। भ्रष्टाचार और महंगाई के अन्तर्संबंध को समझा जा सकता है लेकिन इसके लिए किसी के आधारभूत ढांचे से खिलवाड़ नहीं होने दिया जा सकता है। लेकिन दिल्ली की मौजूदा सरकार के मुखिया अरविन्द केजरीवाल जानबूझकर संवैधानिक संकट को बढ़ाने संबंधी स्थितियां पैदा कर रहे हैं, वह एकबारगी तो हैरत में डालता है लेकिन ठहर कर सोचिये तो साफ पता चलता है कि केजरीवाल अपने वायदों की जमीनी सच्चाई से अवगत होने के बाद अब अपनी बचत के लिए सुरक्षित गलियारा तलाश रहे हैं। जनलोकपाल का मुद्दा उन्हें जनाक्रोश से बचा जा सकता है। इसीलिए मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी संवैधानिक सीमाओं को जानने के बावजूद ललकार रहे हैं। उन्हें पता है, जन लोकपाल बिल जिस धरातल पर वह लाना और पारित कराना चाहते हैं, संघीय व्यवस्था में अमान्य और अव्यवहारिक है। जिस तरह संविधान के जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं, ऐसे में जिस भाषा का इस्तेमाल हो रहा है वह किसी भी दृष्टि से वाजिब नहीं है। ऐसा नहीं है कि उन्हें इसका अहसास नहीं है, जानते हुए भी मर्यादा का निरंतर उल्लंघन किया जा रहा है। इसके पीछे सारी कवायद अपनी जिम्मेदारियों से बचने की है। इसके अलावा आगामी आम चुनाव को लेकर अपनी स्थिति को मजबूत बनाने की भी है। इसीलिए उन्हें हर हाल में चर्चा चाहिए।

                                  हाय, हाय ये महंगाई...

आम चुनाव तक महंगाई रूलाती रहेगी, इसमें दो राय नहीं। हालांकि इस बीच मनमोहन सरकार ने गृहणियों को रसोई गैस सिलेण्डरों की तादाद 12 करके राहत जरूर दी है। यह सियासी फैसला चुनाव बाद यथावत रहता है, इसमें संदेह है। क्योंकि सब्सिडी के इस ताजा फैसले से तेल कंपनियों पर पांच हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। फिलहाल तो सियासी दलों को वोट की पड़ी है। तभी तो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कह दिया कि हर परिवार को 24 गैस सिलेंडर मिलने चाहिए। यहीं पर नहीं रूके, उन्होंने गरीब परिवारों को फ्री में गैस मुहैया कराने का सुझाव दे दिया। लेकिन विसंगति देखिये, उत्तर प्रदेश में गुपचुप बिजली की कीमतें बढ़ाने की तैयारी चल रही है। पानी का दाम भी कई गुना बढ़ाये जाने की चर्चा है। हो सकता है, इस पर आम चुनाव तक अमल न हो। लेकिन इतना साफ है कि महंगाई बेलगाम हो रही है। खुद महंगाई के खिलाफ व्यापक आंदोलन छेड़ने वाले अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने के बाद खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। बिजली कंपनियों ने हाथ-खड़े कर दिए और अब दिल्ली वासियों को सरचार्ज के रूप में बिजली के लिए बढ़े दाम देने पडंÞेगे। आठ फीसदी सरचार्ज लगने से यह स्थिति पैदा हुई है। इसमें तिमाही वृद्धि भी होगी। इस नयी परिस्थिति से दिल्ली में राजनीतिक भूचाल भी आ गया है। भाजपा ने ‘आप’ सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस इतने में खुश है कि अब केजरीवाल को आटे-दाल का भाव पता चल रहा होगा। यह तो सियासी बात हुई। इसके मूल में जाएं तो पता चलेगा कि असली कारण क्या है। असली सवाल महंगाई का नहीं है। असली सवाल तो क्रयशक्ति से जुड़ा है। जो देश में कामगारों के वेतन के मौजूदा ढांचे हैं उससे भला कोई कैसे महंगाई से निपट सकता है। कुछ चार-पांच फीसदी सरकारी कर्मचारियों को छोड़ दें तो असंगठित क्षेत्र की व्यापक जनसंख्या रामभरोसे है। योजना आयोग के आंकड़े भी इस बात के गवाह हैं कि प्रति व्यक्ति 20-30 रुपये पर रोजाना गुजारा करते हैं। उनके लिए महंगाई कितनी घातक है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सियासी दलों के लिए महंगाई चुनौती नहीं, बल्कि चुनावी जीत का हथियार साबित हुई है। यही वजह है कि जो भी दल सत्ता से बाहर होता है उसकी पूरी राजनीति इसी के ईर्द-गिर्द केन्द्रित रहती है। जनता पार्टी के जमाने में मोरारजी भाई की सरकार का पतन प्याज की बढ़ी कीमतों के कारण हुआ था। इससे पूर्व पहली बार सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस ढाई साल भीतर सत्ता में वापसी कर चुकी थी। पिछले दिनों भी दिल्ली समेत पूरे देश में महंगाई के नाम पर जबर्दस्त राजनीति हुई। लेकिन इससे निपटने की सरकार के स्तर पर तनिक भी ईमानदार कोशिश नहीं दिखाई दी। कारण और जिम्मेदारी वैश्विक परिस्थितियों पर डाले जाने की चेष्टा होती रही। खुद महंगाई को लेकर लाल हुई दिल्ली ने राहत के लिए केजरीवाल के हाथ को मजबूत किया तो अब वहां से भी इस सवाल पर ठोस समाधान मिलने की उम्मीद कम दिखाई देती है। सख्त तेवरों के बावजूद बिजली कंपनियां घाटे में अब और सेवाएं देने को राजी नहीं हैं।