आप ऐसे तो न थे
भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी के त्वरित उभार ने जिस तरह से सियासी मनीषियों को चौंकाया था, ठीक उसी तरह इतने कम समय में भारी-भरकम विसंगतियां भी चौंका रही हैं। इन दो चौंकाने वाली स्थितियों में फर्क बस इतना है कि अब यह चौंकाने वाला प्रकरण ‘बदलाव की राजनीति’ के द्वार फिलहाल तो बंद करता दिख रहा है। दिल्ली विधानसभा में 28 सीटों से भरोसा जगा था कि आम चेहरे भी सत्ता की सीढ़ियां साफ-सुथरे तरीके से चढ़ सकते हैं। उम्मीद यह भी तब बलवती हुई थी कि भ्रष्टाचार के मुहाने बंद किये जा सकते हैं। लेकिन जिस तरह दो महीने के भीतर सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप को प्राथमिकता मिलती देखी गयी और कई मोर्चांे पर अन्तर्विरोध फूटते देखे गये तो मोहभंग भी होना शुरू हो गया। अब तो हद हो गयी यह ‘नया उभार’ सिफ हां में हां मिलाते हुए मीडिया को भी देखना चाहता है। जो ऐसा न करे उसे लॉकअप में भेजने की मंशा व्यक्त की जाती है। यह नया चेहरा देश का चेहरा बनना चाहता है। पर सवाल अहम ये है कि विद्वेष और घृणा की सियासत करके क्या कोई बदलाव लाया जा सकता है? इतिहास के पास भी ऐसा कोई चरित्र उपलब्ध नहीं है। सभी बुरे हैं, हां वे जरूर अच्छे हैं जो हमारी राय से इत्तेफाक रखते हैं। यह ‘राय’ क्या है, इस बारे में कोई स्पष्ट अवधारणा भी अब तक संज्ञान में नहीं है। सत्ता मिलने पर पार्टी की क्या नीतियां होंगी, देश को विकास के रास्ते पर कैसे आगे ले जाएंगे या फिर सवा अरब के इस 65 फीसदी युवा के सपनों को कहां से पंख मुहैया कराएंगे आदि-आदि जैसे ढेरों सवाल हैं जिसका इस ‘स्वयंभू नेतृत्व’ के पास जवाब नहीं है। लेकिन मीडिया का तो काम ही है सवाल पूछना। चार्टर्ड प्लेन से क्यों गये गुजरात? मुबंई रेलवे स्टेशन पर आप के समर्थकों ने पब्लिक प्रापर्टी को नुकसान क्यों पहुंचाया? डिनर के नाम पर प्रति व्यक्ति 10 हजार रुपये क्यों लिए गये? और आखिरी सवाल उद्योगपतियों को निशाना बनाकर कहां से खड़ा करेंगे औद्योगिक संजाल? तो क्या सिर्फ एनार्की फैलाना चाहते हैं? हालांकि यह नेतृत्व खुद को एनार्किस्ट कहने में गर्व महसूस करता है। वैसे हाल के घटनाक्रमों से इतना तो साफ हो गया है कि ऐसे पल-पल बदलते नेतृत्व को देश की कमान दिये जाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। यही कारण है कि कई साथी रहे लोग अब किनारा करने लगे हैं।कहा भी जाता है कि कोई भी विकास तब ही स्वागत योग्य एवं दीर्घजीवी होता है जब वह मंथर गति से होता है। द्रुत गति का विकास जल्दी ही पराभव की तरफ भी ले जाता है। इस नये किरदार के साथ यही हुआ है।
